For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

अँधेरा मुझमे सो रहा है, माँ तेरे बिन,
डर को मुझमे बो रहा है, माँ तेरे बिन,


घर में घुस आईं हैं, धूल लेकर आंधियां अब,
कि जीना मुस्किल हो रहा है, माँ तेरे बिन,

ठोकरें लौट आई हैं, भर कर पत्थर राहों में,
नज़रों से उन्जाला खो रहा है, माँ तेरे बिन,

उखाड़ दी खिड़कियाँ, दरवाजा भी तोड़ डाला,
जहाँ घर का सामान ढो रहा है माँ तेरे बिन,

तकलीफ कैसे बांधूं, शब्दों में नहीं ताकत,   
अश्क मुझको धो रहा है, माँ तेरे बिन,

उंगली पकड़ चला दो, क़दमों में नही बल है,
देख तेरा बेटा रो रहा है, माँ तेरे बिन.......

Views: 466

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 13, 2012 at 11:20am

आदरणीय अम्बरीश जी, आपको ये रचना पसंद आई बहुत आभारी हूँ. जैसे की आपने मुझे बताया है मैं नित नियम प्रयास कर रहा हूँ त्रुटियों को दूर करने में. ओ. बी. ओ. से जुड़ने के बाद बहुत कुछ सीखा है.

Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 13, 2012 at 11:06am

//उंगली पकड़ चला दो, क़दमों में नही बल है,
देख तेरा बेटा रो रहा है, माँ तेरे बिन.......//

अरुण जी,  माँ ही सब कुछ है इसे ...बहुत अच्छा प्रयास किया है आपने ! बधाई स्वीकारें ! फिर भी इस रचना में शिल्प के स्तर पर सुधार की बहत गुंजायश है....सतत अभ्यास जारी रखें धीरे-धीरे शिल्प भी आ जाएगा ..... . सस्नेह

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 13, 2012 at 10:53am

आदरणीय भ्रमर जी, मित्र आशीष जी बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 13, 2012 at 10:53am

आदरणीया राजेश कुमारी जी, रेखा जी और दीप्ति जी. आपको अच्छा लगा और आपने सराहना की. शुक्रिया

Comment by आशीष यादव on July 13, 2012 at 12:19am

माँ के बिन, जिन्दगी सचमुच अवलम्बहीन लगने लगती है। आपने बखूबी लिखा है। बहुत-बहुत बधाई।

Comment by Rekha Joshi on July 13, 2012 at 12:05am

सुंदर रचना पर हार्दिक बधाई अरुण जी 

Comment by deepti sharma on July 12, 2012 at 10:48pm

तकलीफ कैसे बांधूं, शब्दों में नहीं ताकत,   
अश्क मुझको धो रहा है, माँ तेरे बिन,

उंगली पकड़ चला दो, क़दमों में नही बल है,
देख तेरा बेटा रो रहा है, माँ तेरे बिन....

बहुत ही सुंदर रचना बधाई आपको

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 12, 2012 at 10:23pm

घर में घुस आईं हैं, धूल लेकर आंधियां अब,
कि जीना मुस्किल हो रहा है, माँ तेरे बिन,

ठोकरें लौट आई हैं, भर कर पत्थर राहों में, 
नज़रों से उन्जाला खो रहा है, माँ तेरे बिन, 

अनन्त जी ...सटीक हालात दर्शाती और जोश भरती रचना ...शब्दों पर थोडा ध्यान रखें  ...बधाई 

.मुश्किल , उजाला 

 

भ्रमर ५  ..

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2012 at 10:20pm

बहुत भावनात्मक दिल को छू गई रचना 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Monday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Friday
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Apr 3
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Mar 31
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Mar 31
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Mar 31
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Mar 31

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service