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नेताजी के मन बसा, चटकीला  शृंगार
नेतानी जी सुरसती, सौम्य  रूप  अवतार l
सौम्य रूप  अवतार, सु-संस्कारों की धरणी 
नेताजी की अलग, मगर थी  कथनी करनी l
श्रीमती के दिल की, कभी, तो जीतूँ बाजी
क्या क्या दाँव लगाउं , सोचते  थे  नेताजी
 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 20, 2012 at 1:31pm

 नेता चरित्र का यह हास्य रूप सराहने हेतु आभार नवल  जी 

Comment by Naval Kishor Soni on August 20, 2012 at 11:13am

नेता चरित्र का सुंदर वर्णन ....बधाई प्राची जी .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 19, 2012 at 1:30pm
आपकी टिप्पणी प्रोत्साहित कर रही है आदरणीय राजेश कुमार  झा जी...आपको  रह रचना रूचि, इस हेतु आभार.
Comment by राजेश 'मृदु' on August 19, 2012 at 1:07am

सुंदर कुण्‍डलियां आगे क्‍या हुआ यह जानने की इच्‍छा रहेगी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 18, 2012 at 10:55am

आपको यह हास्य कुण्डलिया पसंद आयी, यह मेरे लिए ख़ुशी की बात है, इस हेतु आपका आभार आ. अविनाश जी 

Comment by AVINASH S BAGDE on August 18, 2012 at 10:30am

श्रीमती के दिल की, कभी, तो जीतूँ बाजी

क्या क्या दाँव लगाउं सोचते  थे  नेताजी l wah...

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