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ये  हादसे -
महज
अखबार की सुर्खियाँ
 पढ़कर इन्हें
जगती नहीं  संवेदना
 बेस्वाद नहीं होतीं
 चाय की चुस्कियां
ये हादसे............
देख- सुन
अत्याचार अनाचार
कछुवे की भांति निर्विकार
सर घुसा लेते हैं
विश्रांति की खोह में
सुस्ताते दो पल
और भूल जाते सब कुछ
जीने के मोह में
पाषाण बन जाती हैं
अनुभूतियाँ
ये..................
नुक्कड़,  चौराहों में
दफ्तर, मुह्ल्लों में
उछलते हैं जब
  मुद्दे यही
तो पान की पीक से
तर दाँत
और सिगरेट का धुंआ
उड़ाते मुख
देते जागरूकता की
गवाही
भुना लेते हैं विचार-
अभिव्यक्तियाँ
ये...............





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Comment

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Comment by Vinita Shukla on September 13, 2012 at 9:31pm

प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद रेखा जी.

Comment by Rekha Joshi on September 13, 2012 at 5:02pm

देख- सुन 
अत्याचार अनाचार 
कछुवे की भांति निर्विकार 
सर घुसा लेते हैं 
विश्रांति की खोह में 
सुस्ताते दो पल 
और भूल जाते सब कुछ 
जीने के मोह में 
पाषाण बन जाती हैं 
अनुभूतियाँ अति सुंदर अभिव्यक्ति विनीता जी ,हार्दिक बधाई 

Comment by Vinita Shukla on September 13, 2012 at 2:19pm

उत्साहवर्धन के लिए आभारी हूँ, सौरभ पांडे जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 13, 2012 at 1:51pm

आज आदमी का घटनाओं और दुर्घटनाओं के सापेक्ष लगातार असंवेदनशील होते जाना आपकी रचना में कितनी गहनता से उभर कर आया है. वाह ! आपकी आगामी रचनाओं के प्रति उत्सुकता बनी रहेगी, विनिता जी.

शुभकामनाएँ

Comment by Vinita Shukla on September 13, 2012 at 12:15pm

आभार अम्बरीश जी, योगी जी.

Comment by Yogi Saraswat on September 13, 2012 at 11:24am

नुक्कड़,  चौराहों में
दफ्तर, मुह्ल्लों में
उछलते हैं जब
  मुद्दे यही
तो पान की पीक से
तर दाँत
और सिगरेट का धुंआ
उड़ाते मुख
देते जागरूकता की
गवाही
भुना लेते हैं विचार-
अभिव्यक्तियाँ
ये...............

विनीता जी , जितने सुन्दर शब्द उससे भी बेहतर विषय ! गंभीर विषय , सवाल छोड़ जाता है ! bahut सुन्दर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 13, 2012 at 11:15am

//देख- सुन
अत्याचार अनाचार
कछुवे की भांति निर्विकार
सर घुसा लेते हैं
विश्रांति की खोह में
सुस्ताते दो पल
और भूल जाते सब कुछ
जीने के मोह में
पाषाण बन जाती हैं
अनुभूतियाँ//

विनीता जी ! इस शानदार अभिव्यक्ति के लिए बधाई स्वीकारें

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