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आज मॉर्निंग वॉक से लौटते समय सोचा कि जरा सीताराम बाबू से भेंट करता चलूँ| उनके घर पहुँचा तो देखा वो बैठे चाय पी रहे थे| मुझे देखते ही चहक उठे - "अरे राधिका बाबू, आइये आइये...बैठिये.....सच कहूँ तो मुझे अकेले चाय पीने में बिलकुल मजा नहीं आता, मैं किसी को ढूंढ ही रहा था......हा....हा...हा.....|" कहते हुए उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई - "अजी सुनती हो, राधिका बाबू आए हैं........एक चाय उनके लिये भी ले आना|"

फिर हमदोनों चाय पीते हुए इधर-उधर की बातें करने लगे| तभी उन्होंने टेबल पर रखा अखबार दिखाते हुए कहा - "अरे आपने आज का पेपर देखा? इस भ्रष्टाचार के दीमक ने हमारी युवा पीढ़ी को भी पूरा चाट लिया है| ये देखिये आज की हेडलाइंस 'नवपदस्थापित प्रखंड विकास पदाधिकारी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों धराये'| अजी ये लड़का एकदम नया-नया ही बहाल हुआ था, और हालत देखिये| आते-आते भूख लग गई| राधिका बाबू, अगर देखा जाए तो इसमें माँ-बाप का भी कम दोष नहीं है| जाने कैसे माँ-बाप होते हैं जो अपने स्वार्थ के लिये ये पाप की कमाई खुशी-खुशी स्वीकार कर लेते हैं और अपने बच्चों को सही संस्कार नहीं देते|" उनकी ये बात मुझे भी ठीक लगी सो मैंने भी सहमति में सिर हिलाया| फिर कुछ हल्की-फुल्की बातें होने लगीं| आगे बातों ही बातों में मुझे उनकी बेटी सुधा का ख्याल आया जो विवाह के लायक हो गई थी और वो उसके लिये किसी अच्छे रिश्ते की तलाश में थे| मैंने उनसे पूछा - "सीताराम जी, इधर सुधा के लिये कोई लड़का देखा है या नहीं?" वो झट से बोले - "अरे हाँ हाँ राधिका बाबू, मैं तो आपको बताना ही भूल गया| देखा तो है एक लड़का| मेरे एक पुराने परिचित का बेटा है| कार्मिक विभाग में नौकरी करता है| वैसे तो लिपिकीय संवर्ग में है किन्तु ऊपरी आमदनी बड़ी अच्छी हो जाती है| मैं तो अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि बात पक्की हो जाए| बिटिया सुख से रहेगी तो मुझे भी चैन रहेगा|" मैं अवाक था|

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Comment by UMASHANKER MISHRA on September 21, 2012 at 12:51pm

बहुत सुन्दर 

बहुत खूब 

वाह क्या रंग दिखाया भाई ....ऐसा ही है सच  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 20, 2012 at 7:43pm

बहुत सही..  शीर्षक को सार्थक करती लघुकथा है, भाई.

कहते हुए उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई - "अजी सुनती हो, राधिका बाबू आए हैं........एक चाय उनके लिये भी ले आना|"

इस पूरी पंक्ति को यों भी लिखा जाता तो बेहतर होता.. .   कहते हुए उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई दी. 

पुनः बधाई, कुमार अजीतेन्दु जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 20, 2012 at 5:20pm

आपकी लघुकथा दो रूप दिखाने में कामयाब रही एक ही तस्वीर के दो चेहरे हतप्रभ नहीं हूँ यही आज का सच है बहुत बहुत बधाई इस उत्कृष्ट लघु कथा के लिए 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 20, 2012 at 10:46am
हाथी के दात दिखाने के अलग और खाने के अलग 
अच्छी लघु कहानी बधाई कुमार अजितेंदु भाई जी
Comment by लोकेश सिंह on September 20, 2012 at 9:38am

कटु सत्य  को दर्शाती सार्थक उद्देश्य युत कहानी "हांथी  के खाने दांत  दूसरे  दिखाने के दांत  दूसरे ",अच्छे लेखन  के लिए बहुत बहुत साधुवाद ....

Comment by seema agrawal on September 19, 2012 at 11:39pm

"पर उपदेश कुशल बहुतेरे " सार्थक और सटीक कटाक्ष ...बधाई कुमार गौरव जी 

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