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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३७ (बन्दिश में आके शाइरी कुम्हलाके रह गई )

 

दर पे हमारे शाम इक इठला के रह गई

हमको तुम्हारी दास्ताँ याद आके रह गई

 

बहरोवज़न के खेल भी हमने समझ लिए

बन्दिश में आके शाइरी कुम्हलाके रह गई

 

होना था दिल के टूटने के बाद और क्या

ज़िदमें ही ज़ीस्त ख्वाबको झुठलाके रह गई

 

बेबस हुए कुछ इस तरह किस्मतके हाथ हम

तेरी निगाहेनाज़ भी समझा के रह गई

 

मुझको तिरी बेजारियों का कुछ गिला नहीं

मेरी भी ज़िंदगी अना दिखला के रह गई  

 

गुंचे शगुफ्ता हो गए खिल के बिखर गए

दो दिन जवानी आप ही इतरा के रह गई

 

आई सहर तो मिट गई रातों की कशमकश

शब भी सियाह ज़ुल्फ़को बिखरा के रह गई

 

मैं भी न मिल सका उसे पिछले बरसके बाद

तनहा कली कहीं कोई मुरझा के रह गई

 

तर्केवफ़ा की बातको सच था समझ लिया

तेरी नज़र की इल्तिजा उलझा के रह गई

 

आँखें मिलीं ख्यालमें तुझसे जो आज फिर

तेरी जवानी फिर वही शरमा के रह गई

 

खोलेंगे राज़ अब नया चर्चा का बाब क्या

उल्फत अधूरी बात ही बतला के रह गई

 

© राज़ नवादवी

अहमदाबाद, रात्रिकाल ०९.५०,

शनिवार, २९/०९/२०१२

 

बन्दिश- बंधन; ज़ीस्त- ज़िंदगी; निगाहेनाज़- प्यार से भरी नज़र, प्रेयसी की दृष्टि; अना- स्वयं का भाव; गुंचे- कलियाँ; शगुफ्ता- पुष्पित; सहर- सुबह; शब- रात; तर्केवफ़ा- प्रेम विच्छेद; इल्तिजा- गुजारिश, प्रार्थना; बाब- अध्याय

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Comment by राज़ नवादवी on October 8, 2012 at 9:46am

मुह्तरम भाई नादिर साहेब, आपका तहेदिल से शुक्रिया!

Comment by नादिर ख़ान on October 6, 2012 at 11:35pm

behatareen gazal raj bhai 

Comment by राज़ नवादवी on October 3, 2012 at 9:40am

आदरणीया राजेश जी,

//ज़मानेकी तन्कीदें मिलने लगीं

ऐबेकलम की नीवें हिलने लगीं.//

आपकी ख़ास दाद को हमने बहुत ही ख़ास समझ के कुबूल किया है,

सादर!

Comment by राज़ नवादवी on October 3, 2012 at 9:36am

आदरणीय प्रमेन्द्र जी, आपकी टिप्पणियों और प्रशंसा का हृदय से आभार! 

Comment by प्रमेन्द्र डाबरे on September 30, 2012 at 6:35pm

राज़ साहब, लाजवाब हैं आप. इस ग़ज़ल के लिए बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 30, 2012 at 5:21pm

मैं भी न मिल सका उसे पिछले बरसके बाद

तनहा कली कहीं कोई मुरझा के रह गई

 राज नवद्वी जी बेहतरीन ग़ज़ल लिखी है सभी शेर एक से बढ़कर हैं पर ये शेर बार बार पढने को मन करता है दाद कबूल कीजिये 

कृपया ध्यान दे...

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