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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३९ (हम हैं जंगल के फूल तख़लिएमें खिलते हैं )

कैद कब तक रहोगे अपनी ही तन्हाइयों में

ढूंढें मिलते नहीं ज़िंदा बशर परछाइयों में

 

हक़का रिश्ता ज़मींसे है, ये खंडहर कहते हैं

सब्ज़े होते नहीं अफ्लाक की बालाइयों में  

 

खुशबूएं जम गईं गुलनार के पैकर में ढलके

कल की बादे सबा क्यूँ खोजते पुरवाइयों में

 

हम हैं जंगल के फूल तख़लिएमें खिलते हैं

ज़र्द पड़ जाते हैं गुलदस्ते की रानाइयों में

 

फूल वा होते हैं, निकहत बिखर ही जाती है

फर्क कुछ भी नहीं है प्यार और रुसवाइयों में

 

कैसी ज़ेबाई से निकला वो कल रकीबके घर

कोई तिनका सा चुभ गया मिरी बीनाइयों में

 

राज़ साहिल पे बैठने से कुछ नहीं होगा

मोती मिलते नहीं उतरे बिना गहराईयों में

 

© राज़ नवादवी, अहमदाबाद,

शनिवार २९/०९/२०१२ अपराहन्न ०३.२१

 

बशर- व्यक्ति; हक़का रिश्ता- सच का रिश्ता; सब्ज़े- हरियाली, हरे भरे बाग़; अफ्लाक- फलक (आसमान) का बहुवचन; बालाइयों में- ऊंचाइयों में; गुलनार- अनार का फूल; पैकर- शरीर; बादे सबा- सुबह की हवा; तख़लिएमें- एकांत में; रानाइयों में- सौन्दर्य; वा होते हैं- खिलते है; निकहत- खुशबू; ज़ेबाई से- सज-धज के;  बीनाइयों में- दृष्टि में; साहिल- किनारा

 

 

 

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Comment

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Comment by राज़ नवादवी on October 8, 2012 at 9:43am

भाई निमिष जी, आपका तहेदिल से शुक्रिया!

Comment by राज़ नवादवी on October 8, 2012 at 9:40am

भाई सुजान साहेब, आपके ग़ज़ल पढ़ने और पसंद करने का तहेदिल से शुक्रिया. बड़ी हौसलाअफजाई हुई! 

Comment by राज़ नवादवी on October 8, 2012 at 9:38am

आदरणीय वीनस जी, आपकी दाद बहुत ख़ास है हमारे लिए, शुक्रिया भी कैसे करूँ, मगर फिर भी शक्रिया!

Comment by nimish pandya on October 7, 2012 at 5:05pm

bahut khub

Comment by सूबे सिंह सुजान on October 7, 2012 at 2:38pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल है।

Comment by वीनस केसरी on October 7, 2012 at 12:12am

बहुत खूब राज साहिब

ढेरो दाद

Comment by राज़ नवादवी on October 5, 2012 at 5:26pm

आदरणीया सीमा जी, आपकी तारीफ़ और दाद हमारा हौसला बढाती है. अशआर पढ़ने और पसंद करने का तहेदिल से शुक्रिया.

Comment by राज़ नवादवी on October 5, 2012 at 5:23pm

आदरणीया राजेश जी, आपको हमारा कलाम पसंद आया, इसके हम शुक्रगुज़ार हैं. आपकी हौसल अफजाई का बहुत शुक्रिया! 

Comment by seema agrawal on October 5, 2012 at 4:12pm

हम हैं जंगल के फूल तख़लिएमें खिलते हैं

ज़र्द पड़ जाते हैं गुलदस्ते की रानाइयों में

कैसी ज़ेबाई से निकला वो कल रकीबके घर

कोई तिनका सा चुभ गया मिरी बीनाइयों में....वाह क्या बात हा राज़ जी 

राज़ साहिल पे बैठने से कुछ नहीं होगा

मोती मिलते नहीं उतरे बिना गहराईयों में...बहुत खूबसूरत बात .......


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 5, 2012 at 12:36pm

बहुत बढ़िया ,उम्दा ग़ज़ल सभी शेर शानदार हैं 

कैसी ज़ेबाई से निकला वो कल रकीबके घर

कोई तिनका सा चुभ गया मिरी बीनाइयों में

 

राज़ साहिल पे बैठने से कुछ नहीं होगा

मोती मिलते नहीं उतरे बिना गहराईयों में

 ये दोनों बहुत ही ज्यादा पसंद आये 

 

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