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कुरंग (बैरवे) पर एक प्रयास.

देख पिया को सम्मुख,मन हर्षाय,

देखे मुख को गौरी,नयन घुमाय/

 

पागल प्रेम दिवानी,पिया रिझाय,

सुधबुध खोकर अपनी,झूमति जाय/

 

हाथ धरे कभी शीश,चुमती जाय,

बनी मतवाली रीझ,घुमती जाय/

 

मुस्काय दिल पर हाय,घाव लगाय,

व्याकुल मनवा थिरके,चैन न पाय/

 

प्रेम पगे दिल आयी,मिलन कि चाह,

प्रेम बिना सूझे नहि, दूजी राह/

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on October 12, 2012 at 7:19pm

आदरणीय अम्बरीश जी

              सादर प्रणाम, आपके थोड़े परिवर्तन से ही बैरवे कि रंगत निखर आयी है. मै आगे जब बरवै  लिखूंगा तो  इस प्रकार का निखार लाने कि पूरी कोशिश करूँगा. आपके असीम सहयोग के लिए हार्दिक आभार.

Comment by Ashok Kumar Raktale on October 12, 2012 at 7:15pm

आदरणीय प्रभाकर जी

                     सादर प्रणाम, सही कहा आपने शब्दों के मूलस्वरूप पर ध्यान देना आवश्यक है मेरा इस बात पर ध्यान कुछ कम था. आपके महत्वपूर्ण सुझाव के लिए आभार.

Comment by AVINASH S BAGDE on October 12, 2012 at 6:57pm

मुस्काय दिल पर हाय,घाव लगाय,

व्याकुल मनवा थिरके,चैन न पाय/

wah..

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 12, 2012 at 5:34pm

आपके प्रयास को सलाम श्री अशोक रक्ताले जी 

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 4:57pm

//हाथ धरे कभी शीश,चूमे जाय,
बनी मतवाली रीझ,घूमे जाय//

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी आपने सार्थक सुझाव देकर सम चरणों की समस्या का पूर्ण निदान कर दिया है जिसके लिए साधुवाद .... फिर भी इसके विषम चरणों में मामूली सी त्रुटि अभी भी शेष है ....जिसे मेरे विचार में निम्न प्रकार से सुधारना बेहतर रहेगा ....  

//शीश धरे कर मस्तक, चूमे जाय,

मतवाली बन रीझे,  घूमे  जाय//

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 4:47pm

//देख पिया को सम्मुख, मन हर्षाय,

देखे मुख को गौरी, नयन घुमाय//

अति सुन्दर बरवै ...

 

//पागल प्रेम दिवानी, पिया रिझाय,

सुधबुध खोकर अपनी, झूमति जाय//

यह भी कुछ कम नहीं ….

 

//हाथ धरे कभी शीश,चुमती जाय,

बनी मतवाली रीझ,घुमती जाय//

//शीश धरे कर मस्तक, चूमे जाय,

मतवाली बन रीझे,  घूमे  जाय//

 

//मुस्काय दिल पर हाय,घाव लगाय,

व्याकुल मनवा थिरके,चैन न पाय//

मुस्काये अरु दिल पर, घाव लगाय,

व्याकुल मनवा थिरके, चैन न पाय// 

 

//प्रेम पगे दिल आयी, मिलन कि चाह,

प्रेम बिना सूझे नहि, दूजी राह//

//प्रेम पगे दिल  मिल लें , ऐसी  चाह,

प्रेम बिना नहि सूझे,  दूजी राह//

बरवै रचने के इस सद्प्रयास के लिए बहुत बहुत बधाई !


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 10:49am

बरवै छंद में सुन्दर अभिव्यक्ति दी है आदरणीय रक्ताले जी. लेकिन कहीं कहीं मात्राएँ बराबर करने की गरज से शब्दों से मूल स्वरूप से खिलवाड़ दुरुस्त नही लग रहा. उदाहरण के तौर पर:


//हाथ धरे कभी शीश,चुमती जाय,
 बनी मतवाली रीझ,घुमती जाय// इसे अगर यूं कर लिया जाये तो कैसे रहेगा?

हाथ धरे कभी शीश,चूमे जाय,
बनी मतवाली रीझ,घूमे जाय

बहरहाल इस सद्प्रयास हेतु मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें.

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