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ग़ज़ल "बह्र मुजारे मुसम्मन अखरब मक्फूफ़ महजूफ"

===========ग़ज़ल=============
बह्र मुजारे मुसम्मन अखरब मक्फूफ़ महजूफ
वज्न- २ २ १ - २ १ २ १ - १ २ २ १ - २ १ २

चेह्रा है आपका या हसीं माहताब है
ये नाजुकी बदन की बड़ी लाजबाब है

गोरा बदन है ऐसे के छू लें तो सुर्ख हो
जुल्फें हैं रेशमी औ लबों पे गुलाब है

सब लोग घूरते हैं तुझे सर से पा तलक
निकलो न बेनकाब ज़माना ख़राब है

पढने लगे तो डूब गए गर्क-ए-दीद में 
आँखें नहीं वो इश्क की ताज़ा किताब है

उनसे मिली निगाह तो कहने लगी सुनो
आखों से "दीप" पी लो पुरानी शराब है

संदीप पटेल "दीप"

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Comment by PHOOL SINGH on November 12, 2012 at 1:30pm

संदीप  जी प्रणाम.......

सुंदर अतिसुंदर भावपूर्ण गजल ......"सपरिवार सहित आपको शुभ दीपावली"

फूल सिंह

Comment by Arun Sri on November 6, 2012 at 12:43pm

पढने लगे तो डूब गए गर्क-ए-दीद में 
आँखें नहीं वो इश्क की ताज़ा किताब है ........ वाह ! बहुत बढ़िया सर जी ! भा गया आपका रूमानी अंदाज ! बहुत बढ़िया //निकलो न बेनकाब ज़माना ख़राब है// इसकी जगह कुछ और लिख लेते तो और मज़ा आता पढ़ने में !

Comment by Sonam Saini on November 6, 2012 at 12:38pm

nice ghazal sandeep ji

Comment by नादिर ख़ान on November 5, 2012 at 6:19pm

पढने लगे तो डूब गए गर्क-ए-दीद में 
आँखें नहीं वो इश्क की ताज़ा किताब है 

उनसे मिली निगाह तो कहने लगी सुनो
आखों से "दीप" पी लो पुरानी शराब है

 

वाह क्या कहने उम्दा गज़ल ।

Comment by लतीफ़ ख़ान on November 5, 2012 at 3:22pm

श्री संदीपजी , ग़ज़ल के लिए बधाई ..अशआर उम्दा हैं |एक मशविरा है...उर्दू शायरी में प्रेयषी के लिए स्त्रीलिंग का प्रयोग नहीं किया जाता आप का मक्ता यूं होना चाहिए ....उन से मिली निगाह तो कहने लगे सुनो

Comment by रविकर on November 5, 2012 at 10:53am

आभार भाई संदीप जी |

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