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शब्द शून्य संसार (कुण्डलिया छंद )डॉ प्राची

भाव शून्यता क्या रचे, शब्दों की रसधार 
सर्वस लय कर मन बने, शब्द शून्य संसार ll
शब्द शून्य संसार, शांत गहरे सागर सा 
पाए निज विस्तार, अखंड अनंताम्बर सा ll
अक्षय अच्युत ब्रह्म,  असत् है सारी द्विजता 
सत्य नित्य आनंद, प्रदात्री भाव शून्यता ll

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 25, 2012 at 5:59pm

रचना में निहित भावों को सराहने हेतु आभार आ. प्रदीप जी 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 25, 2012 at 4:47pm

ati sundar rachna 

sundar bhaav piroye aapne 

badhai 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 23, 2012 at 10:25pm

अनुमोदन और सराहना हेतु हार्दिक आभार आदरणीय सौरभ जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 23, 2012 at 1:09am

उच्च वैचारिकता को शब्द-समर्थन मिला है. बहुत खूब.

बधाई हो, आदरणीया प्राची जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 22, 2012 at 10:01am

हार्दिक धन्यवाद आदरणीया राजेश कुमारी जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 21, 2012 at 9:42pm

उत्कृष्ट कुंडलिया छंद के लिए हार्दिक बधाई प्रिय प्राची 

कृपया ध्यान दे...

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