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दिन कहीं छुप खो गया है, रात भी बाकी नहीं।

मुश्किलें हैं हर कदम पर, बात बन पाती नहीं।।

 

इक दफा दिल पे कभी, जो राज कोई कर गया।

दूरियां हों लाख चाहे, याद फिर जाती नहीं।।

 

दिल्लगी कर दिल दुखाना, ठीक ये आदत नहीं।

पास तेरे दिल नहीं, तू और जज्बाती नहीं।।

 

नाज तेरी मैं वफ़ा पे, रात दिन करता रहा।

बेवफा तेरी कहानी पर, जुबाँ गाती नहीं।।

 

जख्म गर नासूर बनके, जिस्म को छलनी करे।

मौत है ये जिंदगी, जो मौत कहलाती नहीं।।

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Comment by अरुन 'अनन्त' on December 17, 2012 at 12:00pm

शुक्रिया अशोक सर अपना स्नेह व आशीष यूँ ही बनाये रखें

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 16, 2012 at 12:27am

अरुण जी

         सादर, सुन्दर गजल वाह दाद काबुल फरमाएं.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 6, 2012 at 12:04pm

बहुत-2 शुक्रिया आदरेया राजेश कुमारी जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 3, 2012 at 10:21pm

प्रिय अरुण बहुत शानदार ग़ज़ल लिखी है सभी शेर काबिले तारीफ हैं दाद कबूल कीजिये 

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 3, 2012 at 5:08pm

ह्रदय के अन्तःस्थल से शुक्रिया सर

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on December 3, 2012 at 3:56pm

अरुन जी बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने...और ये एक शेर तो पूरी ग़ज़ल पर भरी पद गया है....माँशाल्लाह क्या लाजवाब शेर हुआ है॥

इक दफा दिल पे कभी, जो राज कोई कर गया।

दूरियां हों लाख चाहे, याद फिर जाती नहीं।।

दिली दाद कुबूल करें !

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 3, 2012 at 11:20am

आदरणीय योगराज सर आपकी टिप्पणियां मेरे लिए बेहद मायने रखती हैं, मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता, अनेक-2 धन्यवाद सर


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 3, 2012 at 11:16am

सुन्दर ग़ज़ल, सुन्दर भाव। हार्दिक शुभ-कामनाएं अरुण शर्मा जी।

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 3, 2012 at 11:09am

शुक्रिया मेहरबानी वीनस भाई आपसे ही सीख रहा हूँ, अनेक-2 धन्यवाद आपको

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 3, 2012 at 11:07am

आदरणीय अरुण सर ह्रदय के अन्तःस्थल से शुक्रिया

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