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रोज़ ढलते सूरज के साथ,
जन्म लेने लगती कुछ बूँदें 
रोज़ सुबह उठ, उन बूँदों को भी मै पाता हूँ,
पर खो जाती,वो चढ़ते सूरज के साथ....
तब पूछता मै खुद से....
सूरज ही तो था इनका जनक, फिर...फिर
क्यों कर मिटा दी उसने अपनी ही उत्त्पत्ति?
सोचते-सोचते उभर आती फिर कुछ बूंदे
पर होती नहीं वो ओंस....
और इस तरह ....ढलने लगता ...एक और सूरज
और जन्म लेने लगती फिर कुछ बूँदें ........

"विवेक"

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Comment

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Comment by Vivek Shrivastava on February 8, 2013 at 1:13am
Dhanywaad Mahima jee
Comment by MAHIMA SHREE on February 7, 2013 at 10:13pm

सुंदर भावाभिव्यक्ति के लिए बधाई स्वीकार  करें

Comment by Vivek Shrivastava on February 6, 2013 at 11:58pm

Thanks a lot surabh sir 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 6, 2013 at 9:06pm

वैचारिकता को बधाई.

आपका सहर्ष स्वागत है, भाई विवेकजी.

Comment by Vivek Shrivastava on February 6, 2013 at 7:15pm

धन्यवाद संदीप भाई 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 6, 2013 at 7:01pm

क्या बात है बहतरीन ताना बाना बधाई हो

Comment by Vivek Shrivastava on February 6, 2013 at 6:50pm

परम आदरणीय विजय सर एवं रविकर सर कृपया आदरणीय सम्भोदित कर लज्जित ना कीजिये ...आप के आशीष वचन शिरोधार्य हैं ...सादर प्रणाम  

Comment by vijay nikore on February 6, 2013 at 6:21pm

आदरणीय विवेक जी,

सुन्दर भावाभिव्यक्ति के लिए सधुवाद।

विजय निकोर

Comment by रविकर on February 6, 2013 at 5:45pm

स्वेद कण / ओस ,
बहुत बढ़िया है -
आदरणीय शुभकामनायें -

Comment by Vivek Shrivastava on February 6, 2013 at 5:06pm
Thanks a lot Dr Prachi for precious words of appreciation.

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