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शाम सी जिंदगी गुजरती है

रात कितनी करीब लगती है

 

याद नित पैरहन बदलती है

ये शमा बूंद बन पिघलती है

 

आंत महसूस अब नहीं करती

भूख पर आंख से झलकती है

 

हम जहां पर खड़े अभी तक थे

वो जमीं देखिए दरकती है

 

होम करने करीब आए तो

इस लपट से ये देह जलती है

                - बृजेश नीरज

 

 

 

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Comment by बृजेश नीरज on March 31, 2013 at 10:12am

आदरणीय संदीप भाई आपका बहुत आभार!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on March 31, 2013 at 10:04am

वाह वाह क्या अंदाज है बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है

दाद क़ुबूल फरमाइए जनाब

जय हो

Comment by बृजेश नीरज on March 31, 2013 at 10:01am

आदरणीया राजेश जी आपका आभार! आपको रचना पसन्द आयी मैं परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 31, 2013 at 9:33am

बहुत-बहुत सुंदर लिखा है आपने रदीफ काफिया वजन सब संपूर्ण है दिली दाद कबूले

 

Comment by बृजेश नीरज on March 30, 2013 at 5:31pm

भाई राम शिरोमणि जी आपका आभार!

Comment by ram shiromani pathak on March 30, 2013 at 5:10pm

वाह बृजेश भाई बेहद सुन्दर ग़ज़ल कही है ढेरों दाद कुबूल करें..

Comment by बृजेश नीरज on March 30, 2013 at 8:22am

आदरणीय सलीम जी आपका आभार!

Comment by बृजेश नीरज on March 30, 2013 at 8:21am

आदरणीय सौरभ जी आपका आभार! आपको रचना पसन्द आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ।
सादर!

Comment by SALIM RAZA REWA on March 30, 2013 at 7:45am

ACHCHI GAZAL HAI NIRAJ BHAI ...UMDA KHYAL


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 29, 2013 at 11:56pm

होम करने करीब आए तो
इस लपट से ये देह जलती है...   वाह ! 

ग़ज़ल को बावज़्न अच्छा निभाया आपने. दाद कुबूल करें..

कृपया ध्यान दे...

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