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दर्द में आपने कमी कर दी
अपनी यादें जो अजनबी कर दी ।
 
 
आँख भर इश्क का समंदर था
रूठकर कैसी तिश्नगी कर दी ।
 
 
मामला घर में ही सुलझ जाता
बात छोटी सी थी, बड़ी कर दी ।
 
 
फैसला जब दिया तो मक़्तल में
जान आफ़त में थी, बरी कर दी ।
 
 
और क्या देंगे मुफलिसी में तुम्हें
नाम तेरे ये जिंदगी कर दी ।

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Comment

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Comment by वेदिका on July 1, 2013 at 9:56pm

क्या बात है स्नेही आशीष जी! 

बेहतरीन और संजीदा गजल पे बहुत सारी बधाई!  

और क्या देंगे मुफलिसी में तुम्हें

नाम तेरे ये जिंदगी कर दी ।

आखिरी शेअर ने तो कमाल की छाप छोड़ी है !!

Comment by Sushant Jain 'Ankur' on July 1, 2013 at 9:30pm

Aye haye .. Akhiri sher .. bahut hi khoob.

 

~ Sushant Jain 'Ankur'

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 18, 2013 at 10:44pm

आदरणीय Saurabh Pandey सर, आपका हर लफ़्ज हौसला-अफजाई करता है ।
तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ।  :)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 17, 2013 at 12:20am

भाई आशीषजी, आपने वाकई कमाल किया है. मतले ने जिस आसानी से असीम को ससीम किया है वह आपकी रचनाधर्मिता को स्वर दे रहा है.

इसी तरह मामला घर में ही  वाला शेर बन पड़ा है. लेकिन कमाल किया है आखिरी शेर ने.

बहुत-बहुत बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएँ.

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 10, 2013 at 10:38pm
Comment by Ashok Kumar Raktale on April 10, 2013 at 8:49am

सुन्दर गजल आदरणीय आशीष जी. बधाई कुबुलें.

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 9, 2013 at 8:31pm

विवेक मिश्र जी,

बृजेश कुमार सिंह (बृजेश नीरज) जी,

Tilak Raj Kapoor जी

Rajesh Kumar Jha जी

ग़ज़ल पसंद करने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत आभार ।

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 9, 2013 at 7:46pm

सरल शब्दों में बड़ी बात! बधाई आ० आशीष जी..!

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 9, 2013 at 7:44pm
Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 9, 2013 at 7:40pm

बहुत-बहुत शुक्रिया विजय मिश्र जी।

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