For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

स्वतंत्रता के 66 वर्ष  बाद, जन सामान्य को क्या मिला? आज भी सोने की चिड़िया के बचेखुचे पंख, भक्षक बन कर रक्षक ही नोच रहे हैं, अल्पसंख्यकों का एक वर्ग असुरक्षा के नाम पर बहुसंख्यकों पर अविश्वास कर रहा है- राजनेताओं की दादुरनिष्ठाओं से सभी हतप्रभ हैं: - संस्कारहीन समाज अपनी दिशाहीन यात्रा के उन मील के पत्थरों पर नाज कर रहा है जिनके नीचे शोषितों की आहें दफन हैं। ऐसे में, भारतीय लोकतन्त्र का चेहरा किस स्वर्णिम आभा से चमक रहा है?

 

विभेद-की सृष्टि का भेद राजनीति जाने, खेद शहीदीशोणित व्यर्थ हो जाने का है

निरंकुश सत्तालोलुप, श्वानचेष्टी चापलूस, दुराचारी बाहुबली वर्ग पनप जाने का है.

धराशायी करके लोकतन्त्र को चेरी मान, राजभवनों में अंकशायी करवाने का है.

कैसी मर्यादा और, कहां की शालीनता,  मुद्दा आपाधापी से राज हथियाने का है.

 

सभी हैं अशान्त क्लान्त, दिखते मगर धीरवीर, अवसरवादिता ही मूल सिद्धान्त है.

देश की सीमाएं, शत्रु से आक्रान्त लेकिन, प्राथमिकता आज अब देश नहीं प्रान्त हैं.

हो गए परमाणुशक्ति, शस्त्रायुध से लैस तो क्या, घर में ही भेदी कई शत्रु दुर्दांत हैं.

आसन्न संकट में भी, कुत्ताफजीती करें, दूध के धुले ये भ्रष्ट, जन जन अब भ्रांतहैं.

 

जैचन्द ओ मीरजाफर, उपदेश करें देशप्रेम, विषवमन ही मात्र जिनकी पहिचान है.

लाचार-बेचारगी की बानगी से सत्ताधीश, आत्मस्तुति में रत, क्या निराली शान है.

देशहित के नाम पे, विरोध मात्र साध के, सदन में फैलाएं आतंक वो महान हैं.

बात बात बदलें पाला, हर पल हर घड़ी, देख इन दोगलों को गिरगिट हैरान है.

 

चुनाव की वैतरणी, तरने को साथ साथ, सांप और नेवलों की एकता सिद्ध है.

भारत के लालों को तो, सांस भी मुहाल अब, सूखी रोटी भी मिलना निरुद्ध है.

ललनाओं की लाज पे गाज का आग़ाज़ देख आत्मबलिदान हेतु कौन सन्नद्ध है?

जीवन दुश्वार देशसेवा भी व्यापार हुई, राष्ट्रहित काज आज कौन प्रतिबद्ध है?

 

कमर नहीं प्राणशक्ति तोड़ती महंगाई, बदबूदार कीच बिच खिल रहा कमल है.

देश की दशा को देख, दुर्दशा भी रो रही, संवेदनहीनतन्त्र कैसा भुजबल है.

दिशाहीन लोकशक्ति साधन सामर्थ्यहीन, ताकती कोटि कोटि आंखें सजल हैं.

नैन नहीं चेहरे पे लगाओ बड़े चाव से, छियासठ साल में पाया सोने का काजल है!

-मौलिक, अप्रकाशित रचना.

Views: 666

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 23, 2013 at 8:34am

बहुत ही व्याकुलता भरी सुन्दर रचना पर सादर हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय सुरेन्द्र वर्मा साहब.

Comment by coontee mukerji on April 20, 2013 at 2:35am

सोने का कजल बहुत सटीक उदाहरण दिया है आपने  ......... लेकिन क्या करें यहाँ सब राम भरोसे है..जागरूक रचना के लिये

बधाई स्वीकार करें. सादर कुंती .

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 18, 2013 at 10:02pm

आदरणीय सर जी सादर प्रणाम
बहुत ही भाव पूर्ण रचना सर जी
शायद यही हकीकत है इस सोने की चिडया की
जय हो
बहुत बहुत बधाइ इन उद्गारों के लिए

Comment by वेदिका on April 18, 2013 at 8:31pm

जैचन्द ओ मीरजाफर, उपदेश करें देशप्रेम, विषवमन ही मात्र जिनकी पहिचान है// ऐसे घृणित लोगो के बदौलत ही ये हाल हुए है

दिशाहीन लोकशक्ति साधन सामर्थ्यहीन, ताकती कोटि कोटि आंखें सजल हैं.
सादर सुंदर वेदना की अभिव्यक्ति आदरणीय सुरेन्द्र जी!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 18, 2013 at 6:51pm

स्वतंत्र भारत की तरक्की के स्वप्न देखती आँखों का वास्ता जब सच्चाई से होता है और सत्तालोलुप राजनीति की पग पग पर हुई कारगुजारियों से मन क्रंदित होता है..तब कवि हृदय में उमड़ते भावों की सार्थक अभिव्यक्ति के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएँ 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 18, 2013 at 5:37pm

कवि जो एक लम्बा जीवन व्यतित किया हो, समय ने बहुत कुछ दिखाया होगा, आज हम जिस माहौल में जी रहे है, या जो देख रहे है, उसपर कवि का मन व्यथित होना स्वाभाविक है, कवि का आक्रोश उसकीकविता में अभिव्यक्त हो रही है, बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति, इस प्रस्तुति पर कवि को कोटि कोटि बधाईयाँ ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.  आपका हार्दिक धन्यवाद "
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी "
Friday
Ashok Kumar Raktale posted blog posts
Friday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता…"
Friday
Sushil Sarna posted blog posts
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । "
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दु पर सहमत…"
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर…"
Thursday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service