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आज हमे दोनों वक़्त खाना मिल जायेगा

बंज़र होती धरती
किसान बे-हाल है
सोच रहा है इस बार भी पानी मिलेगा
मेरी फसल को या नही
या गुजरे कई सालो जैसा ही
ये साल है .........
सोच रहा है ......
क्या कम होगा .......?????
इस बार मेरे कर्ज का बोझ
या कहीं हर साल की तरह इस साल भी तो 
बढ़ नही जायेगा दिल पर मेरे
अन्नदाता होने का बोझ ..........
पढ़- लिख कर लोग बड़े बनते हैं
मैं ठहरा अनपढ़  गंवार ........
नाम अन्नदाता है मेरा
मगर मेरे घर में नही खाने को
दाने चार ..........
रह -रह कर बाबा की बाते
याद आती हैं मुझको आज
बेटा पढ़-लिख ले तू तो
वरना रह जायेगा मुझ जैसा गंवार .......
काश कि मैं भी पढ़ लेता
तो आज बड़ा आदमी होता ....
जिस अनाज को उगाकर भी भूखा सोता हूँ
खरीद लेता उसको दो पल में ही
देकर मैं कुछ पैसे बाज़ार ......
बाबा तो फिर भी अच्छे थे
लेकिन मैं तो हूँ इतना मजबूर
कहता है मेरा बेटा मुझसे
बाबा मैं भी जाउंगा स्कूल ...
मैं नजरे बचाकर कहता हूँ उससे

तू मेरे साथ काम पर चलेगा बेटा तो
आज हमे दोनों वक़्त खाना मिल जायेगा .....!!!!!

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on May 22, 2013 at 10:41pm

आदरणीया सोनम जी सादर, सुन्दर रचना  है, कुछ अति शयोक्ति हो सकती है किन्तु मजबूरियाँ भी कम नहि सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by वेदिका on May 22, 2013 at 1:59pm
अतुकांत शैली में सुंदर प्रयास प्रिय सोनम जी! 
किन्तु मुझे ये पंक्तियाँ ग्राह नही हो सकीं 

काश कि मैं भी पढ़ लेता 
तो आज बड़ा आदमी होता ....
जिस अनाज को उगाकर भी भूखा सोता हूँ 
खरीद लेता उसको दो पल में ही 
देकर मैं कुछ पैसे बाज़ार ......

अगर वो बड़ा आदमी होता तो मतलब कोई न कोई छोटा होता जो अन्न उगाता है तो फिर भी समस्या वहीं की वहीं रह जाती है इन्ही पंक्तियों में ....
मुझे लगता है की समस्या का मूल अशिक्षा है ....किसान होना नहीं ...आजकल MBAs भी किसानी कर रहे है और मलेशिया जैसे देशों में लोग अपनी कुछ  एकड़ जमीन से कई गुनी पैदावार कर रहे है ..
दुसरे पक्ष पर गौर किया जाये तो आपने जो समस्या सामने रखी "अनावृष्टि" वह मात्र किसान की समस्या नही वरन इकोलॉजी असंतुलन की समस्या है एक एक प्राणी की समस्या है जिसे हम सबको ही सुलझाना है ...वरना हम सबको ही भुगतान करना होगा 
फ़िलहाल सुन्दर विचारों पर बधाई स्वीकारिये 
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 22, 2013 at 12:43am
आदरणीया सोनम जी ..आपने बहुत ही सही विषय पर विचार करके अपनी कविता लिखी है, हालाँकि किसान पढा लिखा हो या गवाँर, पर इक आशा में रहता है! कि इस वार वह अधिक मेहनत करेगा, खुद के परिवार औऱ देशवासियों के लिऐ कुछ कर दिखायेगा ...

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 21, 2013 at 10:12pm

प्रिय सोनम सैनी जी 

अनावृष्टि के चलते किसान को ही जब अन्न न नसीब होता हो ..उस स्थिति के दर्द को, मजबूरी को, शब्दबद्ध करने का सुन्दर प्रयास किया है.. हार्दिक बधाई 

Comment by aman kumar on May 21, 2013 at 2:43pm

बहुत  अच्छी कविता ! आपका आभार 

Comment by बृजेश नीरज on May 21, 2013 at 1:33pm

आदरणीया मेरे गांव में तो किसानी का ऐसा कोई काम नहीं होता कि उसके लिए स्कूल न जाया जा सके। आपके गांव में कोई ऐसा काम होता हो तो नहीं कहा जा सकता। किसानों की समस्याएं अपनी जगह हैं। देश के किसानों के जो बदतर हालात हैं उससे कौन इंकार कर सकता है। किसान गंवार हो या पढ़ा लिखा समस्याएं कहां कम होने वालीं।
बहरहाल, आप प्रसन्न रहें।

Comment by Sonam Saini on May 21, 2013 at 1:26pm

आदरणीय ब्रजेश नीरज जी नमस्कार
ये तो आपने सही समझा कि लिखने से पहले मैं सोचती नही हूँ, हाँ लिखने के दौरान थोडा सोच लेती हूँ ,....
किसान के हालात, उसपर बढ़ता कर्ज का पढ़ाई से क्या संबंध है ?? इस सवाल का जवाब वो हजारो, लाखो बच्चे
बेहतर दे पाएंगे जिनकी पढाई सिर्फ इसलिए छुड़ा दी जाती है क्यूंकि उन्हें अपने माँ -पापा के साथ काम पर जाना होता है ,
.धन्यवाद 
 

Comment by Sonam Saini on May 21, 2013 at 1:17pm

आदरणीय अभिनव अरुण जी नमस्कार
रचना को पसंद करने हेतु आभार  व धन्यवाद

Comment by Sonam Saini on May 21, 2013 at 1:11pm

आदरणीय राजेश कुमार झा जी नमस्कार
आप क्या कहना चाह रहे हैं मैं समझ रही हूँ , जैसे मैंने जवाहर सर को दी गयी प्रतिक्रिया में कहा है कि जैसे पांचो उंगलिया एक सामान नही होती वैसे ही सभी किसानो की हालत भी एक जैसी नही है , लेकिन अधिकतर किसानो/ मजदूरो की यही हालत है ....ये मैंने हकीक़त में देखा है ...........प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद

Comment by Sonam Saini on May 21, 2013 at 1:08pm

धन्यवाद आदरणीय केवल प्रसाद जी

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