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गंजे का दर्द (घनाक्षरी )

बाल सभी झड़ गये,बुढ्ढा अब  दिखता हूँ !
हमउम्र औरतें भी,चाचा कह देती हैं !!
पत्नी भी मारे है ताना,भाग्य मेरे फूट गये !
कभी कभी वो भी मुझे,बुढ्ढा कह देती है !!


अपने ही जब कभी,अपना मज़ाक ले लें  !
किससे कहूँ कितनी,पीड़ा मुझे होती है
छुपते छुपाते कभी,दर्पण में देखूं जब !
पत्नी देख मुझे फिर,हा हा हँस देती है !!

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक/अप्रकाशित

Views: 957

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Comment by ram shiromani pathak on June 4, 2013 at 6:36pm

हार्दिक आभार भाई विजय मिश्र जी //सादर 

Comment by विजय मिश्र on June 4, 2013 at 1:32pm
बहुत बहुत सुंदर , बधाई हो भाई राम शिरोमणजी . छोटी सी रचना मगर जादू सा असर छोड़ती है . खटमिट्ठी जैसी है आपकी यह रचना .
Comment by ram shiromani pathak on June 4, 2013 at 11:59am

hardik aabhar bhai aman ji//////

Comment by ram shiromani pathak on June 4, 2013 at 11:59am

hardik aabhar adarneey ravikar ji//////

Comment by aman kumar on June 4, 2013 at 9:07am

अरे ! ये क्या !बही सहाब  समस्या इतनी बड़ी है की .........

अति सुंदर !

Comment by रविकर on June 3, 2013 at 4:53pm

अच्छी कोशिश पर साधुवाद,
गंजों का गंजन स्वाभाविक -
बधाई आदरणीय-

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 3, 2013 at 3:22pm
आदरणीय ...राम शिरोमणी जी "आभार व हार्दिक शुभकामनायें
Comment by ram shiromani pathak on June 3, 2013 at 3:18pm

hardik aabhar shyam narain ji/////

Comment by ram shiromani pathak on June 3, 2013 at 3:17pm
Comment by ram shiromani pathak on June 3, 2013 at 3:16pm

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