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पिता,परमात्मा सा होता है

पिता परमात्मा सा होता है

जो जन्म देकर दुनिया में ले आता है

वो दुनिया दिखाने वाला पिता,परमात्मा से कैसे कम है

हमारी आहट से जो सन्न हो जाता है

जिसके भीतर हर पल हमारे पालन की चिन्ता पलती है

जो हमें जन्म देने के बाद,

अपने सारे सुख भूल जाता है।।

दुनिया में हमारे आने के बाद

वो एक राह पर ही चलता है

और अपने पुरातन ताज्य कार्य भी छोड देता है

उसकी दुनिया हमारी आहट से बदल जाती है

वो पिता परमात्मा सा होता है।।

                                                 सूबे सिंह सुजान

मौलिक  व  अप्रकाशित 

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Comment by सूबे सिंह सुजान on June 16, 2013 at 4:30pm

 vijayashree........... आपका आभार,,,,,,आपने अपने विचारों से अवगत कराया.........धन्यवाद...........

Comment by सूबे सिंह सुजान on June 16, 2013 at 4:28pm

 coontee mukerji....जी , आपका आभार,,,,,,आपने अपने विचारों से अवगत कराया.........धन्यवाद

Comment by सूबे सिंह सुजान on June 16, 2013 at 4:28pm

बृजेश नीरज......ji,,आपकी बात से सहमत हूँ गद्यात्मक से बचना चाहिये..........और मैं बचता भी हूं ......यह कभी-कभार होजाता है

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 14, 2013 at 11:52pm
आदरणीय..सुजान जी, माता पिता ईश्वर से भी बड़े होते हैं, उनकी महिमा सर्वोपरि है ।सुंदर प्रस्तुतिकरण ...शुभकामनाऐं
Comment by vijayashree on June 14, 2013 at 8:57pm

माता -पिता के बारे में जितना भी लिखा जाए ..कम ही लगता है ...

सुंदर रचना /बधाई

Comment by coontee mukerji on June 14, 2013 at 1:17am

बहुत सुंदर सुजान जी /सादर / कुंती

Comment by बृजेश नीरज on June 12, 2013 at 10:18pm

आदरणीय सुजान जी,
माता पिता की महिमा जितनी गायी जाए उतनी कम है। आपको इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।
आपसे एक निवेदन है कि अतुकांत लिखते समय कृपया गद्यात्मकता से बचने का प्रयास करना चाहिए।
सादर!

Comment by सूबे सिंह सुजान on June 11, 2013 at 10:42pm

Rajesh Kumar Jha....जी............आपकी प्रस्तुति सही है

अहत पुरुष जारे पितु-माता,तिसपर कन्‍यादान विधाता

चास करे औ फसल चराए, ठूंठ चूस मन को समझाए

Comment by सूबे सिंह सुजान on June 11, 2013 at 10:41pm

Shyam Narain Verma..........जी स्वागत

Comment by राजेश 'मृदु' on June 11, 2013 at 6:18pm

बिल्‍कुल सच लिखा है आपने । एक पिता अपने दायित्‍व को वहन करते हुए अर्धनारीश्‍वर ही होता है । कुछ पंक्तियां पिता के लिए मेरी तरफ से यूं हैं

' अहत पुरुष जारे पितु-माता,तिसपर कन्‍यादान विधाता

चास करे औ फसल चराए, ठूंठ चूस मन को समझाए

सादर

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