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आल्हा छंद - प्रथम प्रयास

गड़ गड़ करता बादल गर्जा, कड़की बिजली टूटी गाज
सन सन करती चली हवाएं, कुदरत हो बैठी नाराज
पलक झपकते प्रलय हो गई, उजड़े लाखों घर परिवार
पल में साँसे रुकी हजारों, सह ना पाया कोई वार

डगमग डगमग डोली धरती, अम्बर से आई बरसात
घना अँधेरा छाया क्षण में, दिन आभासित होता रात
आनन फानन में उठ नदियाँ, भरकर दौड़ीं जल भण्डार

इस भारी विपदा के केवल, हम सब मानव जिम्मेदार

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 24, 2013 at 8:06pm

आ0 अरून अनन्त भाई जी, ’घना अँधेरा छाया क्षण में, दिन आभाषित होता रात
आनन फानन में उठ नदियाँ, भरकर दौड़ीं जल भण्डार
इस विपदा आफत के केवल, हम सब प्राणी जिम्मेदार
’ सुन्दर प्रयास हुआ है। हार्दिक शुभकामना स्वीकारें। सादर,

Comment by वेदिका on June 24, 2013 at 7:23pm

बहुत ही करुण रचना, जो हुआ जैसा हुआ उसे बिंदुवार  दर्शाती हुयी। 

 //इस विपदा आफत के केवल // …. दोनों शब्द के एक ही अर्थ निकल रहे है, मालूम नही की उन्हें एक साथ प्रयोग कर सकेंगे या नही ,,,

खैर इस समय रचना धर्मिता पर चर्चा करने से पहले आवश्यक है कुशल क्षेम की प्रार्थना …. ! 

 

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