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अनसुलझे प्रश्न // डॉ० प्राची

प्रकृति पुरुष सा सत्य चिरंतन 

कर अंतर विस्तृत प्रक्षेपण 

अटल काल पर

पदचिन्हों की थाप छोड़ता 

बिम्ब युक्ति का स्वप्न सुहाना...

अन्तः की प्राचीरों को खंडित कर

देता दस्तक.... उर-द्वार खड़ा 

मृगमारीची सम

अनजाना - जाना पहचाना... 

खामोशी से, मन ही मन

अनसुलझे प्रश्नों प्रतिप्रश्नों को 

फिर, उत्तर-उत्तर सुलझाता...

वो,

अलमस्त मदन 

अस्पृष्ट वदन 

गुनगुन गाये ऐसी सरगम 

हर सुप्त स्वप्न को दे थिरकन

क्षणभंगुर जग का हर बंधन ,

फिर भी,    क्यों ऐसे देवदूत से 

बंधन ये अन्अंत पुराना सा लगता है ?

क्यों एक अजनबी जाना पहचाना लगता है?

मौलिक एवं अप्रकाशित 

डॉ० प्राची 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 4, 2013 at 5:03pm

प्रिय नीरज मिश्रा जी 

//अब इतनी सुन्दर कविता की तारीफ भी कैसे वर्णन हो .....
दीपक से रवि की आभा का कहिये किस भाँति प्रदर्शन हो ....//

रचना को इतनी खूबसूरत काव्य पंक्तियों द्वारा मान देने के लिए बहुत बहुत आभार.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 4, 2013 at 4:55pm

आदरणीय शरदिंदु जी 

सादर नमस्कार !

रचना का कथ्य प्रवाह आपके अन्तः पाठक को संतृप्त कर सका , तो रचना लेखन सार्थक ही हुआ समझ रही हूँ .

//इस रचना की गूंज मानस के अंजाने प्रकोष्ठ में भी झंकृत होती रहेगी लम्बे समय तक आदरणीया प्राची जी. आनंद की इस नयी अनुभूति से साक्षात्कार  कराने के लिये पाठक आपके ऋणी रहेंगे.//

इन विशेष शब्द भावों  के लिए एक रचनाकार भी स्वयं को आप सम पाठकों का ऋणी ही अनुभव करेगा आदरणीय 

सादर.

Comment by रविकर on July 4, 2013 at 4:55pm

सुन्दर प्रस्तुति -
आभार आदरेया -


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 4, 2013 at 4:51pm

आ० शिज्जू जी 

रचना पर आपके अनुमोदन के लिए ह्रदय से आभारी हूँ .

आदरणीय प्रयुक्त शब्द थाप ही है क्योंकि यहाँ किसी पटल पर दृश्य छाप की बात नहीं वरन अनंत काल में सदा के लिए गूंजते भाव नाद की बात है. उम्मीद है मैं स्पष्ट कर पायी 

सादर.

Comment by ram shiromani pathak on July 4, 2013 at 4:47pm

वो,

अलमस्त मदन 

अस्पृष्ट वदन 

गुनगुन गाये ऐसी सरगम 

हर सुप्त स्वप्न को दे थिरकन///वाह अद्भुत शब्द संयोजन ///

मंत्र मुग्ध हो गया मै///आदरणीया प्राची जी प्रणाम सहित हार्दिक बधाई आपको ///


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 4, 2013 at 4:46pm

आदरणीय राजेश झा जी 

प्रस्तुत रचना की तथ्यात्मकता की सर्वग्राह्यता पर आपका अनुमोदन रचना के प्रति मुझे भी आश्वस्त कर गया..इस मुखर सराहना कर  आश्वस्ति प्रदान करने के लिए मैं आपकी ह्रदय से आभारी हूँ.

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 4, 2013 at 4:43pm

प्रिय गीतिका जी 

आपके पाठक मन को इस अतुकांत रचना का प्रवाह व तथ्य संतुष्ट कर सके ये इस रचना के लिए गौरव की बात है. मैं आपकी ह्रदय से आभारी हूँ.

सस्नेह.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 4, 2013 at 4:11pm

बहुत खूब | अनसुलझे प्रश्न पर अन्तर्द्वन्द को बखूबी उकेरा है आपने |

पदचिन्हों की थाप छोड़ता 

बिम्ब युक्ति का स्वप्न सुहाना...

अन्तः की प्राचीरों को खंडित कर

देता दस्तक उर-द्वार खड़ा 

मृगमारीची सम

अनजाना - जाना पहचाना... बिलकुल यही होता है | दरअसल  जब मन से मन के तार मिले तो, अनजाना भी जाना पह्चाना लगता है |

पदचिन्हों की थाप भी धुन निकाल मद मस्त करदे | ऐसी चिंतन युक्त रचना के लिए हार्दिक बधाई डॉ प्राची सिंह जी | वाह !

Comment by Neeraj Nishchal on July 4, 2013 at 2:47pm

बहुत गहरा लिखा है आपने तो ....अभी इतनी तो
हैसियत नही अपनी कि आपकी कविता के बारे में
कुछ कह पाऊं ........
अब इतनी सुन्दर कविता की तारीफ भी कैसे वर्णन हो .....
दीपक से रवि की आभा का कहिये किस भाँति प्रदर्शन हो ....
बहुत बहुत हार्दिक शुभ कामनाये प्राची जी ...........................


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 4, 2013 at 2:43pm

//प्रकृति पुरुष सा सत्य चिरंतन

कर अंतर विस्तृत प्रक्षेपण

अटल काल पर

पदचिन्हों की थाप छोड़ता

बिम्ब युक्ति का स्वप्न सुहाना...//....असाधारण अभिव्यक्ति...पदचिन्ह यहाँ मूक इंगित  (छाप) नहीं अपितु सस्वर नाद ("थाप") हैं, चेतावनी हैं. इस रचना की गूंज मानस के अंजाने प्रकोष्ठ में भी झंकृत होती रहेगी लम्बे समय तक आदरणीया प्राची जी. आनंद की इस नयी अनुभूति से साक्षात्कार  कराने के लिये पाठक आपके ऋणी रहेंगे. 

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