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जरूरत है प्रयास की 

कोशिश की 

कंक्रीट का जंगल 

और ठसाठस सड़के हैं 

नीला अंबर धूल धूसरित है 

उहापहो की स्थिति है 

इतने विशाल शहर में

हम और तुम निहायत अकेले हैं 

जीवन का उद्देश्य 

केवल जीवन यापन है 

नित्य क्रम की नियति को 

समझ लिया खुशी का समागम 

खोखली हंसी 

छिछला प्यार 

दिखावे के लिए मिलना जुलना 

केवल सतही संतुष्टि है 

झाँक कर देखा अंदर 

तो अजीब तरह का खोखलापन है 

गाहे बगाहे मैं भी हिस्सा हूँ इसी भीड़ का 

होंठो पे मुस्कान 

आँखों मे खुशी का भ्रम है 

अपने अन्तर्मन में 

अनगिनत प्रश्नों का सावन है 

क्यूँ हम इसके बाहर 

आने का रास्ता नहीं ढूंढते 

क्यूँ हम झूठ मे ही रहना 

पसंद करते हैं 

क्या भ्रम है 

क्या लोभ है 

पूछो स्वयं से 

अपने आपसे 

ये प्रश्न उठाओ..... 

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Amod Kumar Srivastava on July 28, 2013 at 11:04am

dhanyawad Saurabh Pandey jee..  utsahvardhan ke liye.. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 18, 2013 at 4:45pm

रचना प्रस्तुति हेतु हार्दिक धन्यवाद ... प्रयासरत रहें भाईजी.. .

शुभम्

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 15, 2013 at 10:51pm

आदरनिया प्राची जी .... मैं आपके कथन से पूर्णतः सहमत हूँ... आभार ... 

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 15, 2013 at 10:50pm

आदरणीय रविकर जी  बहुत बहुत आभार ... धन्यवाद ... 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 15, 2013 at 3:42pm

संवेदनहीन हुए कंकरीट के आलीशान जंगलों में जीता आदमी वास्तव में अंदर से खोखला ही है... स्वयं से इसपर प्रश्न करने और उत्तर खोजने को प्रेरित करती अभिव्यक्ति...सादर बधाई इस रचना पर 

रचना को और रोचक व प्रभावशाली  बनाया जा सकता था..कथ्य जन मानस से जुड़ा है फिर भी कहीं कहीं सपाटबयानी सी प्रतीत हो रही है.

शुभकामनाएँ 

Comment by रविकर on July 15, 2013 at 10:08am

खला खोखलापन हमें, भ्रमित ख़ुशी का दास |
प्रश्न उठाओ स्वयं से, कुछ तो करो प्रयास ||

बहुत बढ़िया है आदरणीय-
आभार आपका-

कृपया ध्यान दे...

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