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ग़ज़ल : कहानी तुम अमर कर दो

बहर : हज़ज मुरब्बा सालिम
१२२२, १२२२

दिवाना दिल जिगर कर दो,
इधर भी तो नज़र कर दो,

फलक से चाँद लाऊं मैं,
इशारा तुम अगर कर दो,

अकेले रास्ता मुश्किल,
सुहाना तुम सफ़र कर दो,

हजारों मैं ग़ज़ल कह दूँ,
सरल थोड़ी बहर कर दो,

पिला दो हाँथ से अपने,
सुधा बेशक जहर कर दो,

मुहब्बत मैं अजय कर दूँ,
कहानी तुम अमर कर दो...

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 5, 2013 at 12:28am

अकेले रास्ता मुश्किल,
सुहाना तुम सफ़र कर दो,........वाह! बहुत खूब ,यह शेर जबर्दस्त है

आदरणीय अरुण अनंत जी, बहुत सुंदर गजल, तहे दिल से दाद कुबूल कीजियेगा 

Comment by shubhra sharma on August 4, 2013 at 10:29pm

आदरणीय अरुण  जी ,सुन्दर गजल के लिए  बहुत बहुत बधाई

Comment by बृजेश नीरज on August 4, 2013 at 7:12pm

वाह! बहुत ही सुन्दर! अरुन भाई आपको हार्दिक बधाई इस प्रेम में पगी सुन्दर रचना पर!

Comment by MAHIMA SHREE on August 4, 2013 at 2:14pm

बढिया है ..आदरणीय अनंत जी बधाई आपको


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 3, 2013 at 11:20pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है| बह्र को १२ के बजाय २१ में बांधना सही है| शुभकामनाएं|

Comment by Neeraj Nishchal on August 3, 2013 at 9:01pm

बहुत सुन्दर बहुत लाजवाब ।

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