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नज़्म - सिगरेट सी ज़िन्दगी

उँगलियों के बीच फँसी
सिगरेट की तरह
कब से सुलग रही है ज़िन्दगी
सैकड़ों ख्वाब हैं,
कश-दर-कश, धुआँ बनकर
भीतर पहुँच रहे हैं..
ज्यादातर का तो
दम ही घुटने लगता हैं
और भाग जाते हैं लौटती साँसों के साथ ।
पर कुछेक हैं,
जो छूट गए हैं भीतर ही कहीं
पड़े हुए हैं चिपक कर, टिककर..
इन दिनों एक-एक कर मैं
उन्हीं ख़्वाबों को
मुकम्मल करने में लगा हूँ.

मिलूँगा फिर कभी
कि अभी ज़रा जल्दी में हूँ
मेरी सिगरेट ख़त्म होने को है..


(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by विवेक मिश्र on August 12, 2013 at 3:40am
आदरणीय सौरभ जी - इस तुच्छ सी रचना ने आपके ह्रदय के तारों को झंकृत किया, यह सुनकर ही मन आह्लादित है। मैं तो जिस दिन, आपकी टिप्पणियों के समतुल्य भी कुछ लिख सका, उस दिन से स्वयं को 'कवि' समझूँगा। स्नेह बनाए रखें।
इलाहाबाद आईं आ रउरा से भेंट कईला बिनु चल जाईं, अईसनो हो सकेला का गुरूजी.. :-)

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 3:17pm

इस रचना ने मुझे दूर तक छुआ है. कारण कि, आपकी ही उम्र में मैंने भी लिखा था --

चाहे जो हो / कुछ करे / मेरा आसमान सिगरेट नहीं पीता है... 

और जाने क्या-क्या.. :-))

आज तो वह कविता जाने कहाँ होगी, मेरे पास नहीं है. 

आज फिर सिगरेट एक कवि का उसी तरह से मिलता-जुलता बिम्ब बना है. बधाई

भाई, इलाहाबाद कब आवत बाड़ऽ.. ? सर्हियाइ के बधाई देतीं.  हा हा हा .. . 

Comment by विवेक मिश्र on August 8, 2013 at 7:52pm
बहुत धन्यवाद प्राची जी।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 8, 2013 at 11:30am

ज़िंदगी को परिभाषित करती एक अलग सी अभिव्यक्ति..

हार्दिक बधाई 

Comment by विवेक मिश्र on August 8, 2013 at 2:21am
विजय निकोरे जी - मेरा यह प्रयास आपको रूचा, तहेदिल से आभारी हूँ।
* एक निवेदन - वस्तुतः मैं कोई कवि वगैरह नहीं। आप जैसे गुणीजनों का सानिध्य बना रहे तो सीखने की प्रकिया अनवरत चलती रहे। कृपया मेरे लिए 'आदरणीय' सम्बोधन प्रयोग न करें। :-)
Comment by vijay nikore on August 7, 2013 at 10:30am

आदरणीय विवेक जी:

 

//जो छूट गए हैं भीतर ही कहीं
पड़े हुए हैं चिपक कर, टिककर..
इन दिनों एक-एक कर मैं
उन्हीं ख़्वाबों को
मुकम्मल करने में लगा हूँ.//

 

वाह...वाह...वाह!  बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by विवेक मिश्र on August 6, 2013 at 5:28pm
सुलभ जी, आशीष जी, शुभ्रा जी - प्रयास को मान देने के लिए हृदय से आभार।
Comment by shubhra sharma on August 6, 2013 at 11:36am

आदरणीय मिश्र जी , जिंदगी और सिगरेट का बहुत खूब तारतम्य बैठाया आपने ,

उँगलियों के बीच फँसी
सिगरेट की तरह
कब से सुलग रही है ज़िन्दगी
सैकड़ों ख्वाब हैं,.............बधाई स्वीकार करे 
Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on August 5, 2013 at 10:07pm

वाह बेहतरीन नज्म विवेक जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2013 at 10:36am

बहुत सुन्दर है विवेक मिश्र जी !

कृपया ध्यान दे...

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