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पांच दोहे

 

खुद के अन्दर झाँक के, पढ़  ले तू आलेख

अपने ऐसे हाल का,  खुद  खींचा  आरेख

 

बाहर पानी से बुझे, कण्ठ लगी जो प्यास

भीतर जी मे जो लगी,कौन बुझाये प्यास

 

पंछी घर को लौटते, साँझ लगी गहराय

रे मन चल लग ठौर से,तू काहे पछुवाय

 

अन्धियारी में जुँ रहे, दीपक ही की खोज

अपने अन्दर खोजना, अपना सुख तू रोज   

 

बंद आँख कर देखिये,त्रितिय आँख की ओर

ध्यान सरलता से करें,तनिक न दीजे जोर

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by M Vijish kumar on January 3, 2014 at 2:06pm

बहुत खूब , आदरणीय अंकल  जी आपको बधाई। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 4, 2013 at 6:20pm

आदरणीय राजेश भाई , आपकी सराहना के लिये , उत्साह वर्धन के लिये, आपका आभार , 

Comment by राजेश 'मृदु' on September 4, 2013 at 6:05pm

सुंदर प्रस्‍तुति है आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 4, 2013 at 3:05pm
आदरणीय लक्ष्मण भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार !!
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 4, 2013 at 2:47pm

aapncho dohe sundar lage  haardik badhaai shri giriraj bhandari ji 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 4, 2013 at 1:57pm

आदरणीय विजय भाई , दोहो पर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिये उत्साह वर्धक है , बहुत बहुत आभार !!

Comment by vijay nikore on September 4, 2013 at 1:46pm

बहुत ही सुन्दर दोहे हैं। हार्दिक बधाई, आदरणीय।

सादर,

विजय निकोर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 3, 2013 at 9:39pm

आदरणीया मंजरी जी , उत्साह वर्धन के लिये बहुत बहुत धन्यवाद , बहुत आभार आपका !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 3, 2013 at 9:38pm

आदरणीय अविनाश भाई , दोहे की सराहना के लिये बहुत बहुत शुक्रिया !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 3, 2013 at 9:36pm

आदरणीय बृजेश भाई , सराहना के लिये बहुत आभार !!

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