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2122   1212     22 

धूप हमको निचोड़ देती है ,

ठंड घुटने सिकोड़ देती है ।

 

पत्तियों को बड़ी शिकायत है,

ये जड़ें भूमि छोड़ देती हैं।

 

चर्चा मुद्दे पे जब भी आती है,

जाने क्यूँ राह मोड़ देती है ।

 

दर खुले ही थे, हमने ये देखा,

ये हवा फिर से भेड़ देती है ।

 

रहनुमाओं की बातें सुन के तो,   

शर्म ख़ुद हाथ जोड़ देती है ।


हाल जैसे ही क़ाबू आता है,

याद क्यों फ़िर से छेड़ देती है ?

 मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

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Comment

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Comment by vandana on September 10, 2013 at 6:56am

चर्चा मुद्दे पे जब भी आती है,

जाने क्यूँ राह मोड़ देती है ।

बहुत बढ़िया आदरणीय गिरिराज सर 

वैसे सर  छोटा मुँह और बड़ी बात होगी  पर मुझे लगता है कि काफिया ओड़ देती है तय हुआ है पहले शेर में लेकिन आगे दो शेरों में यह ऐड के रूप में हो गया यथा भेड़ में .....माफ़ी चाहती हूँ ज्यादा जानकारी नहीं है पर जो महसूस हुआ उसे इंगित करने का दुस्साहस कर रही हूँ कृपया इस लिंक पर व्यंजन काफिया देखिएगा - http://www.openbooksonline.com/group/gazal_ki_bateyn/forum/topics/5...

एक बार फिर आप जैसे वरिष्ठ एवं अनुभवी सदस्य से क्षमा याचना सहित 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2013 at 8:21pm

आदर्णीय शिज्जू भाई , गज़ल को आपकी सराहना मिली ,मेरे लिये बहुत खुशी की बात है !! आपका आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 9, 2013 at 7:45pm

बहुत बढ़िया आदरणीय गिरिराज सर दाद कुबूल फरमायें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2013 at 6:56pm

आदरणीय अभिनव अरुन भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2013 at 6:54pm

आदरणीय सुरेन्द्र भाई , आपकी सराहना और उत्साह वर्धन का हार्दिक आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2013 at 6:52pm

आदरणीय ललित भाई , पहले तो गज़ल की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत हार्दिक आभार  !!!! आप नाक घुसेड़ने जैसी बात कभी न सोचें , मै अभी गज़ल सीख रहा हूँ , आपकी हर सलाह सर आंखो पर !! आपने बहुत उम्दा शेर कहे , मै इसे भी सहेज कर रखूंगा !! मेरी रचना पर ऐसे किसी भी सलाह का मै हार्दिक स्वागत करूंगा !! सादर !!

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on September 9, 2013 at 5:58pm

प्रिय गिरिराज भाई ..सुन्दरऔर सशक्त शेर हुए हैं बहुत बधाई

पत्तियों  को यही शिकायत  है

शाख क्यों साथ छोड़ देती है

 

बात मुद्दे पे जब भी आती है

सरजनी राह मोड़ देती है

सरजनी= बात नहीं मानना

आपके दो खूबसूरत अशआर  में बेवजह

नाक घुसेड दी  है . पसंद आये तो बताएँगे. सादर  

Comment by Abhinav Arun on September 9, 2013 at 1:56pm

बड़े शानदार और सशक्त शेर हुए हैं बहुत बधाई इस पुरअसर ग़ज़ल के लिए श्री गिरिराज जी !! पूरी ग़ज़ल मुग्ध कर गयी ,शानदार !!

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 9, 2013 at 1:43pm

चर्चा मुद्दे पे जब भी आती है,

जाने क्यूँ राह मोड़ देती है ।

रहनुमाओं की बातें सुन के तो,   

शर्म ख़ुद हाथ जोड़ देती है ।

प्रिय गिरिराज भाई ..सुन्दर भाव ..सच में ऐसे बड़े बदलाव देखने को बहुतायत मिलता है सटीक ..
आभार
भ्रमर ५

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