For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

2122   1212     22 

धूप हमको निचोड़ देती है ,

ठंड घुटने सिकोड़ देती है ।

 

पत्तियों को बड़ी शिकायत है,

ये जड़ें भूमि छोड़ देती हैं।

 

चर्चा मुद्दे पे जब भी आती है,

जाने क्यूँ राह मोड़ देती है ।

 

दर खुले ही थे, हमने ये देखा,

ये हवा फिर से भेड़ देती है ।

 

रहनुमाओं की बातें सुन के तो,   

शर्म ख़ुद हाथ जोड़ देती है ।


हाल जैसे ही क़ाबू आता है,

याद क्यों फ़िर से छेड़ देती है ?

 मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

Views: 715

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by vandana on September 10, 2013 at 6:56am

चर्चा मुद्दे पे जब भी आती है,

जाने क्यूँ राह मोड़ देती है ।

बहुत बढ़िया आदरणीय गिरिराज सर 

वैसे सर  छोटा मुँह और बड़ी बात होगी  पर मुझे लगता है कि काफिया ओड़ देती है तय हुआ है पहले शेर में लेकिन आगे दो शेरों में यह ऐड के रूप में हो गया यथा भेड़ में .....माफ़ी चाहती हूँ ज्यादा जानकारी नहीं है पर जो महसूस हुआ उसे इंगित करने का दुस्साहस कर रही हूँ कृपया इस लिंक पर व्यंजन काफिया देखिएगा - http://www.openbooksonline.com/group/gazal_ki_bateyn/forum/topics/5...

एक बार फिर आप जैसे वरिष्ठ एवं अनुभवी सदस्य से क्षमा याचना सहित 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2013 at 8:21pm

आदर्णीय शिज्जू भाई , गज़ल को आपकी सराहना मिली ,मेरे लिये बहुत खुशी की बात है !! आपका आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 9, 2013 at 7:45pm

बहुत बढ़िया आदरणीय गिरिराज सर दाद कुबूल फरमायें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2013 at 6:56pm

आदरणीय अभिनव अरुन भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2013 at 6:54pm

आदरणीय सुरेन्द्र भाई , आपकी सराहना और उत्साह वर्धन का हार्दिक आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2013 at 6:52pm

आदरणीय ललित भाई , पहले तो गज़ल की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत हार्दिक आभार  !!!! आप नाक घुसेड़ने जैसी बात कभी न सोचें , मै अभी गज़ल सीख रहा हूँ , आपकी हर सलाह सर आंखो पर !! आपने बहुत उम्दा शेर कहे , मै इसे भी सहेज कर रखूंगा !! मेरी रचना पर ऐसे किसी भी सलाह का मै हार्दिक स्वागत करूंगा !! सादर !!

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on September 9, 2013 at 5:58pm

प्रिय गिरिराज भाई ..सुन्दरऔर सशक्त शेर हुए हैं बहुत बधाई

पत्तियों  को यही शिकायत  है

शाख क्यों साथ छोड़ देती है

 

बात मुद्दे पे जब भी आती है

सरजनी राह मोड़ देती है

सरजनी= बात नहीं मानना

आपके दो खूबसूरत अशआर  में बेवजह

नाक घुसेड दी  है . पसंद आये तो बताएँगे. सादर  

Comment by Abhinav Arun on September 9, 2013 at 1:56pm

बड़े शानदार और सशक्त शेर हुए हैं बहुत बधाई इस पुरअसर ग़ज़ल के लिए श्री गिरिराज जी !! पूरी ग़ज़ल मुग्ध कर गयी ,शानदार !!

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 9, 2013 at 1:43pm

चर्चा मुद्दे पे जब भी आती है,

जाने क्यूँ राह मोड़ देती है ।

रहनुमाओं की बातें सुन के तो,   

शर्म ख़ुद हाथ जोड़ देती है ।

प्रिय गिरिराज भाई ..सुन्दर भाव ..सच में ऐसे बड़े बदलाव देखने को बहुतायत मिलता है सटीक ..
आभार
भ्रमर ५

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" सादर नमस्कार आदरणीय मंच। कुछ अन्य सुझाव: 1- सदस्यों से सहयोग राशि एकत्रित कर ओबीओ की पत्रिका…"
Monday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अच्छा सुझाव"
Sunday
Gajendra shrotriya replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रतिष्ठित मंच के सभी सम्माननीय सदस्यों को सादर प्रणाम🙏ओ बी ओ परिवार के समक्ष बनी इस विषम परिस्थिति…"
Sunday
Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
Saturday
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
Saturday
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
Saturday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
Saturday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
May 25

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service