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जो ख़्वाबों में बसा लूँ तो .......(गज़ल) //डॉ० प्राची

१२२२...१२२२ 

नज़र दर पर झुका लूँ तो 

मुहब्बत आज़मा लूँ तो 

तेरी नज़रों में चाहत का 

समन्दर मैं भी पा लूँ तो 

बदल डालूँ मुकद्दर भी 

अगर खतरा उठा लूँ तो 

सियह आरेख हाथों का 

तेरे रंग में छुपा लूँ तो 

तेरी गुम सी हर इक आहट 

जो ख़्वाबों में बसा लूँ तो 

तुम्हारे संग जी लूँ मैं  

अगर कुछ पल चुरा लूँ तो 

न कर मद्धम सी भी हलचल 

मैं साँसों को सम्हालूँ तो 

तुम्हें ये राज क्या कहना 

इसे दिल में छुपा लूँ तो 

मौलिक और अप्रकाशित 

Views: 1665

Comment

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Comment by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 12, 2013 at 6:05pm

बहुत ही बेहतरीन..ग़ज़ल....

Comment by vandana on October 9, 2013 at 7:06am

बदल डालूँ मुकद्दर भी 

अगर खतरा उठा लूँ तो 

बहुत सुन्दर गजल आदरणीया डॉ. साहिबा 

Comment by कल्पना रामानी on October 7, 2013 at 9:21pm

सुंदर गजल, आदरणीया प्राची जी, हार्दिक बधाई

Comment by अजीत शर्मा 'आकाश' on October 2, 2013 at 5:10pm

अगर खतरा उठा लूँ तो..........छोटी बह्र की अत्यन्त शानदार एवं दिलकश ग़ज़ल...!!!

Comment by vijay nikore on October 2, 2013 at 4:42am

कोमल एहसासों से भरपूर इस खूबसूरत गज़ल के लिए दाद कबूल करें

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on October 2, 2013 at 1:45am

सियह आरेख हाथों का 

तेरे रंग में छुपा लूँ तो

आदरेया,

सम्पूर्ण ग़ज़ल ही छोटी बह्र और साफ़-सरल शब्दों से अद्भुत हो गई है! विशेष रूप से उपर्लिखित शे'र के तो क्या कहने! अति सुन्दर अलंकारिक छटा! हार्दिक बधाई!

Comment by राज लाली बटाला on September 25, 2013 at 8:41pm

आदरणीया प्राची जी सुन्दर गज़ल हेतु बधाई स्वीकारें 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 25, 2013 at 6:56pm

आदरणीय सुभाष वर्मा जी 

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और प्रोत्साहित करती सराहना के लिए सादर धन्यवाद .

Comment by Saarthi Baidyanath on September 25, 2013 at 5:07pm

उम्दा ग़ज़ल हुई है आदरणीया ...बहुत खूब !..

नज़र दर पर झुका लूँ तो 

तुझे अपना बना लूँ तो 

तेरी नज़रों में चाहत का 

समन्दर मैं भी पा लूँ तो 

बदल डालूँ मुकद्दर भी 

अगर खतरा उठा लूँ तो .... वाह ..वाह और वाह :)

Comment by Subhash Verma "सुखन भोगामी" on September 25, 2013 at 1:34am

तुम्हारे संग जी लूँ मैं
अगर कुछ पल चुरा लूँ तो
न कर मद्धम सी भी हलचल
मैं साँसों को सम्हालूँ तो...............
वाह !!! बहुत खूब, बेहतरीन और मासूम ग़ज़ल, हार्दिक बधाई

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