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तुम्हारे पास समय नहीं होगा - लघु कथा

अपना टूटा चश्मा विनोद की ओर बढ़ाते हुए जमना लाल जी ने कहा – “बेटा मेरा चश्मा कई दिनों से टूटा है , और ये पर्चा लो दवाइयाँ भी “.............। विनोद झुँझला गया – “ क्या पिता जी रोज रोज खिट खिट करते रहते हो मेरे पास इन सब फालतू कामों के लिए बिलकुल समय नहीं है , मै नौकरी करूँ उसकी टेंशन झेलूँ कि आपकी समस्या देखूँ ।” जमना लाल जी कहते रह गए कि – “ बेटा ............. । ”

पर बेटे ने न सुना न उनकी ओर देखा बस अपनी धुन मे चलता चला गया । आज वे थोड़ी थोड़ी लकड़ियां ला ला  कर इकट्ठी कर रहे थे । बेटा और बहू ने पूछा – “ पिता जी ये सब क्या है ?”

वे बोले – “ मेरी चिता की सामाग्री । मैंने सोचा तुम्हारे पास फालतू कामों के लिए और फालतू लोगों के लिए समय नहीं होगा । “

 

 

अप्रकाशित एवं मौलिक

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 16, 2013 at 10:14pm

आदरणीया आन्नपूर्णाजी , ज्यादातर परिवार मे बूढे माँ-बाप की यही स्थिति है , टूटे हुये सोफे की तरह जो  पडे रहते है भंडार गृह मे !! बहुत मार्मिक कथा है !! बधाई !! परंतु इसके पीछे कारण दिये जाने वाले संस्कार ही  है , जो अब भारतीय नही रह गये हैं , आयातित हो गये हैं ! भारतीयता मे वापस आना ही इसका हल है वर्ना आगे और घना अन्धकार है !!

Comment by annapurna bajpai on September 16, 2013 at 10:13pm
आदरणीय प्रभाकर जी आपका हार्दिक आभार ।
Comment by annapurna bajpai on September 16, 2013 at 10:13pm
आदरणीय राज जी आपका आभार ।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 16, 2013 at 9:31pm

बहुत ही सुन्दर और मार्मिक लघुकथा, बधाई स्वीकारें आद० अन्नपूर्णा जी.

Comment by राज़ नवादवी on September 16, 2013 at 9:00pm

आह, आज की पारिवारिक ज़िंदगी का एक मर्मस्पर्शी सत्य; ...और उतना ही मर्मस्पर्शी चित्रण. बधाई हो आदरणीया अन्नपूर्णा जी. 

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