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रूपसी

सुंदर, सकल काया, से सभी के ह्रदय में,

अनुकूल जोश भर, जाती है वो रूपसी,

नयन उचारें जब, मधु से भी मीठे बोल,

तब मदहोश कर, जाती है वो रूपसी,

मन है पवित्र ऐसे, गंगा का हो जल जैसे,

जितने भी दोष, तर, जाती है वो रूपसी,

लता सी कमरिया को, जब लचकाती चले,

सबको बेहोश कर, जाती है वो रूपसी।

-------------------------------- सुशील जोशी

"मौलिक अप्रकाशित"

Views: 988

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Comment by Sushil.Joshi on October 6, 2013 at 2:30am

बहुत बहुत आभार आदरणीय शिज्जू भाई साहब.....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 4, 2013 at 9:43pm

बहुत बढ़िया प्रस्तुति आदरणीय सुशीलजी बधाई स्वीकार करें

Comment by Sushil.Joshi on October 4, 2013 at 9:09pm

बहुत बहुत धन्यवाद आपका आदरणीय संजय जी....

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on October 4, 2013 at 9:14am

क्या ही सुंदर प्रवाहमायी धनाक्षरी रची आपने आदरणीय सुशील भाई जी....

इस निमित्त सादर बधाई स्वीकारें

Comment by Sushil.Joshi on October 4, 2013 at 6:29am

आप सभी आदरणीयों का ह्रदय से आभार.... जिस प्रकार से आप मेरा उत्साह बढ़ा रहे हैं वह देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा है.... एवं और भी अधिक एवं कुछ अच्छा लिखने का मन होता है..... आप सभी अग्रजों को सादर प्रणाम एवं अनुजों को बहुत बहुत स्नेह एवं आशीर्वाद...

Comment by annapurna bajpai on October 3, 2013 at 10:21pm

सुंदर रचना बहुत बधाई आपको । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 3, 2013 at 10:12pm

शृंगार रस पगा सुन्दर कवित्त 

शुभकामनाएं आ० सुशील जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2013 at 9:28pm

ओह्होह.. .   :-))))

Comment by Saarthi Baidyanath on October 3, 2013 at 8:34pm

बढ़िया :)

Comment by Abhinav Arun on October 3, 2013 at 8:29pm

सुन्दर वर्णन करती रचना के हेतु बधाई आदरणीय

.

कृपया ध्यान दे...

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