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टिफिन में कैद रूह

हम क्या हैं
सिर्फ पैसा बनाने की मशीन भर न !

इसके लिए पांच बजे उठ कर
करने लगते हैं जतन
चाहे लगे न मन
थका बदन
ऐंठ-ऊँठ कर करते तैयार
खाके रोटियाँ चार
निकल पड़ते टिफिन बॉक्स में कैद होकर
पराठों की तरह बासी होने की प्रक्रिया में
सूरज की उठान की ऊर्जा
कर देते न्योछावर नौकरी को
और शाम के तेज-हीन सूर्य से ढले-ढले
लौटते जब काम से
तो पास रहती थकावट, चिडचिडाहट,
उदासी और मायूसी की परछाइयां
बैठ जातीं कागज़ के कोरे पन्नों पर....

और आप
ऐसे में उम्मीद करते हैं कि
मैं लिक्खूं कवितायें
आशाओं भरी
ऊर्जा भरी...?

 (मौलिक अप्रकाशित)

Views: 506

Comment

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Comment by anwar suhail on October 6, 2013 at 8:07pm

चूंकि मैंने दूसरा ड्राफ्ट प्रकाशित किया है, मैं इस नज़्म पर और काम करूँगा...आप सभी का आभार...सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 6, 2013 at 3:41pm

आम आदमी की रोज़मर्रा की उबाऊ ज़िंदगी.. जैसे सिर्फ पैसा कमाने की बाध्यता के चलते, किसी रिमोट से जैसे मशीनी मानव चल रहा हो... ऐसे में ह्रदय से संवेदनाओं का मिटता जाना सुन्दरता से प्रस्तुत किया है 

अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक शुभकामनाएं 

Comment by vijay nikore on October 6, 2013 at 3:08am

बेहद खूबसूरत रचना के लिए बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by वेदिका on October 5, 2013 at 11:38pm

ज़िंदगी की रफ्तार मे दिन रात की थकान और फिर ज़िंदगी ..... 

बहुत खूब !!

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 5, 2013 at 9:09pm

अति उम्दा रचना है आपकी ! बधाई आपको और उम्मीद बढ़ गयी है ऐसी ही बेहतरीन रचनाये पढने की !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 5, 2013 at 12:18am

ओह.. !!  कविता ने रशे-रेशे की पीर का बथना उजागर कर दिया है. मशीनी ज़िन्दग़ी फ़ैक्ट्री की भट्ठी में अपनी सोच और हुलास को झोंकती रोज़ धुक रही है. और रीतती हुई उम्र ऊब, खीझ, टीस और वही-वहीपन के दर्राते दाँतदार पहियों से निचुड़ रही है. कलम और ज़िन्दग़ी के एक मज़दूर के दर्द और उसकी निराशा को अभिव्यक्त करती इस रचना के लिए बधाई..

Comment by annapurna bajpai on October 4, 2013 at 11:44pm

क्या खूब रही ? टिफिन मे कैद रूह !! बढिया दिल को छूती रचना । 

Comment by Sushil.Joshi on October 4, 2013 at 9:50pm

वाह वाह आदरणीय अनवर भाई..... सचमुच यही सच्चाई है आजकल.... और हम लोगों का यही दिनक्रम है.... लेकिन एक कवि मन को कभी हताश नहीं होना चाहिए भाई जी..... ऐसे में तो हमें ज़रूरत है सभी को ऊर्जावान करने की..... कहते हैं ना... जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि..... वैसे सच्चाई को व्यक्त करती इस रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 4, 2013 at 9:39pm

आदरणीय अनवर भाई , हर मध्यम वर्ग  के लिये यही सच्चाई है !! सुन्दर रचना के लिये बधाई !!

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