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बेटी सुहाती मोहे, जस हो चंदन भाल ।
पाकर बेटी तुझे मै, हो गया हूं निहाल ।।
हो गया हूं निहाल, परी सी पंख लगाऊ ।
शिक्षा व संस्कार दे, सारा गगन घूमाऊ ।
तू करना सब काम, जग में हो मेरा नाम।
दुनिया कहे ऐसा, बेटा बन गया बेटी ।।

.............................................
मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 17, 2013 at 1:14am

सुधीजनों की सलाहों और उनके विधानजन्य मंतव्यों पर अवश्य ध्यान दें, भाईजी.

आप छंदों पर काम कररहे हैं यह कम श्लाघनीय नहीं है.

शुभेच्छाएँ.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 11, 2013 at 3:04pm

aadarneey ramesh jee ..mujhe shilp kee jaankaaree nahee hai ..bhav paksh mujhe bahut bhaya ...saadar badhaaayee ke sath 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 9, 2013 at 1:56pm

आदरणीय रमेश भाई , बहुत सुन्दर भाव , लिये कुंडलिया के प्रयास के लिये आपको बधाई !!!!

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 9, 2013 at 1:26pm

आदरणीय रमेश जी आपकी कुण्डलिया ने निराश किया भाई जी आपने पहले भी कुण्डलिया छंद लिखा है और इससे कहीं बेहतर लिखा है इतनी जल्दबाजी क्यूँ भाई इतने सुन्दर भाव हैं किन्तु शिल्पगत त्त्रुटियों ने भाव को खा लिया. कृपया ओबीबो में समूह का अनुसरण करें.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 9, 2013 at 10:43am

पंख लगे जब भाव को, छंद ज्ञान हो माथ

ओबीओ में सीख ले, मिलता सबका साथ |----

भाई शुशील जोशी जी की सलाह पर गौर करे  | रचना के भाव के लिए बधाई  

Comment by Sushil.Joshi on October 9, 2013 at 6:40am

भाव बहुत खूबसूरत हैं आदरणीय रमेश जी... लेकिन शिल्प में अनेक त्रुटियाँ हैं.... इसकी प्रथम दोनों पंक्तियों यानि दोहे के विषम चरणों के अंत में दो गुरु ठीक प्रतीत नहीं होते.... इसी प्रकार से इसके रोला भाग में भी दोष हैं... आप कुण्डलिया छंद की जानकारी इसी फोरम के समूह शीर्षक में ले सकते हैं.... बधाई इस रचना के लिए....

Comment by Abhinav Arun on October 9, 2013 at 5:15am

अच्छी रचना सन्देश परक आपकी कलम को नमन है साधुवाद !!

कृपया ध्यान दे...

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