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गजल: दर पे कभी किसी के भी सज्दा नहीं किया//शकील जमशेदपुरी//

बह्र: 221/2121/1221/212

_____________________________

दर पे कभी किसी के भी सज्दा नहीं किया
हमने कभी जमीर को रुसवा नहीं किया

हमराह मेरे सब ही बलंदी पे हैं खड़े
पर मैंने झूठ का कभी धंधा नहीं किया

जाने न कितनी रात मेरी आंख में कटी
नींदों से तेरे ख्वाब का सौदा नहीं किया

मजबूर था सो बोल दिया झूठ चांद से
तुमने हमारे जख्म को ताजा नहीं किया

मुद्दत के बाद पूछना कैसे हो तुम 'शकील'
एहसास छेड़ कर के ये अच्छा नहीं किया

-शकील जमशेदपुरी

______________________________

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 19, 2013 at 2:05pm

क्या बात है जोरदार ग़ज़ल कही है बधाई हो

आदरणीय वीनस जी ने जो कहा है उसे अवश्य देख लेंगे आप

जय हो

Comment by शकील समर on October 18, 2013 at 8:52am

आदरणीय वीनस सर
गजल चमचमा रही है ये आपके अमूल्य सुझावों का ही परिणाम है। कृपा दृष्टि बनाए रखिएगा। आभार है।

Comment by वीनस केसरी on October 17, 2013 at 9:22pm

बहुत शानदार ग़ज़ल कही है भाई ... अशआर दुरुस्त हो गए हैं ... ग़ज़ल चमचमा रही है
ढेरो दाद

एहसास छेड़ कर के
---
छेड़ क्रिया है .. कर सहायक क्रिया है ... के शब्द भर्ती का है इसे हटाना पड़ेगा


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 17, 2013 at 7:27pm

आपकी ग़ज़ल ने दिल खुश कर दिया, शकील साहब. अश’आर से ग़ज़ल छलक कर बाहर आ रही है.

बहुत-बहुत बधाई.. . वाह

Comment by विजय मिश्र on October 16, 2013 at 6:10pm
शकील भाई , बहुत खूब लिक्खा , शुक्रिया ."

मजबूर था सो बोल दिया झूठ चांद से
तुमने हमारे जख्म को ताजा नहीं किया | - एहसास की मासूमियत काबिलेतारीफ .
Comment by अरुन 'अनन्त' on October 16, 2013 at 4:23pm

आदरणीय शकील भाई बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही है आपने सभी अशआर पसंद आये खासकर अंतिम शेर अधिक पसंद आया उसके लिए विशेष दाद कुबूल फरमाएं.

Comment by Saarthi Baidyanath on October 15, 2013 at 5:57pm

चंद अशआर बहुत अच्छे लगे शकील साहब ...बढ़िया !...बधाई स्वीकारें ! विद्वजनों की बातें भी अमल में लायें..नमन   :)

Comment by शकील समर on October 15, 2013 at 3:19pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी
बहुत बहुत आभार आपका।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 15, 2013 at 3:14pm
आदरणीय शकील भाई , बहुत लाजवाब गज़ल कही है !!!!! दिली दाद कुबूल करें !!!

हमराह मेरे सब ही बलंदी पे हैं खड़े
पर मैंने झूठ का कभी धंधा नहीं किया --------- बहुत सुन्दर भाई वाह !!!!
Comment by शकील समर on October 15, 2013 at 3:05pm

आदरणीय वीनस सर द्वारा दिए गए सुझावों के तहत गजल को संशोधित किया गया है। एक बार पुन: आप सभी शिल्प के जानकारों का ध्यान चाहूंगा। सादर।

कृपया ध्यान दे...

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