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लोभ कपट को त्यागकर ,रखो परस्पर नेह !
शुद्ध विचारों से करो ,शीतल अपनी देह !!१

याचक भी राजा बना ,राजा मांगे भीख !
काल चक्र से भी तनिक ,ले लो भाई सीख !!२

इतना तुम क्यूँ रो रहे ,भाई घोंचू लाल !
किसने पीटा आपको ,गाल दिखे हैं लाल!!३

अधर तुम्हारे पुष्प से ,मेरे प्यासे नैन !
जिस दिन तुम दिखती नहीं ,रहता हूँ बेचैन !!४

उन्हें देख जलने लगा ,मन का बुझा चिराग !
शनै: शनै: अब फैलती ,पूरे तन में आग !!५

विरह आग में जल रही ,नयनों में था नीर !
अपलक राह निहारती ,विरहन तृषित अधीर !!६

चंचलता जिसमें भरी ,खुजली करता जाय !
वानर का बस काम ये, छीन झपट कर खाय !!७
*********************************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 993

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Comment by ram shiromani pathak on November 8, 2013 at 11:17pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ  जी। सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 2, 2013 at 4:30am

खिचड़ी अच्छी बनी है. बहुत-बहुत बधाई लें. और आगे भी खिलाते रहें. .. :-)))

शुभ-शुभ

Comment by ram shiromani pathak on October 30, 2013 at 8:13pm

आपका अमूल्य  सुझाव बहुत अच्छा लगा मुझे   ////// बहुत बहुत आभार आदरणीया प्राची जी। …सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 30, 2013 at 12:31pm

सुन्दर दोहावली प्रिय राम शिरोमणि पाठक जी 

विरह आग में जल रही ,नयनों में था नीर !...................विरह अगन में जल रही, नयनों में ले नीर (यदि ऐसे करें तो ?)
अपलक राह निहारती ,विरहन तृषित अधीर !!६

हार्दिक शुभकामनाएं 

Comment by ram shiromani pathak on October 28, 2013 at 7:13pm

bahut bahut aabhar adarneey bhai rajesh ji...saadar

Comment by राजेश 'मृदु' on October 28, 2013 at 2:52pm

बढि़या खिचड़ी है राम जी, बहुत-बहुत बधाई

Comment by ram shiromani pathak on October 27, 2013 at 9:22pm
Bahut bahut aabhar bhai ramesh ji...saadar
Comment by ram shiromani pathak on October 27, 2013 at 9:20pm
Bahut bahut aabhar adarneey laxman ji...saadar
Comment by रमेश कुमार चौहान on October 27, 2013 at 7:05pm

वाह रामशिरोमणीजी बहुत खूब । बधाई  बधाई

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 27, 2013 at 6:53pm

सार्थक और भावपूर्ण दोहे रचे है | बधाई श्री रामशिरोमणि पाठक जी 

कृपया ध्यान दे...

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