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ग़ज़ल - देख लेना क्रान्ति अपनी रंग लायेगी ज़रूर

ग़ज़ल

 

देख लेना क्रान्ति अपनी रंग लायेगी ज़रूर

ये महा हड़ताल शासन को झुकायेगी ज़रूर

 

देखकर गहरा अंधेरा किसलिए मायूस हो

रात कितनी भी हो लम्बी भोर आयेगी ज़रूर

 

हौसला हालात से लड़ने का होना चाहिए

आयेंगे तूफ़ां तो कश्ती डगमगायेगी ज़रूर

 

अब बग़ावत पर उतर आओ सुनो पूरी तरह

वर्ना ये सत्ता तुम्हें  भी नोंच खायेगी ज़रूर

 

ये हमारी सारी माँगें मान तो ली जायेंगी

हाँ मगर सरकार हमको आज़मायेगी ज़रूर

 

कर रही है कर्मचारी हित को अनदेखा तो फिर

तय समझ लो अब ये सत्ता चरमरायेगी ज़रूर

 

संगठित होकर दिखा दो संगठन में शक्ति है

जो विरोधी शक्ति होगी मुँह की खायेगी ज़रूर

 

माँगने से यदि न मिल पाये तो बढ़कर छीन लो

हर सफलता ख़ुद-ब-ख़ुद क़दमों में आयेगी ज़रूर

 

आग जो सुलगायी है हमने वो पाते ही हवा

दुश्मनों का चैन-सुख एक दिन जलायेगी  ज़र

             ______________

[मौलिक अप्रकाशित]

 

राज्य कर्मचारी अधिकार मंच की महा हड़ताल को समर्पित                              

अजीत शर्मा आकाश’  [शिक्षा विभाग, इलाहाबाद ]

_______________________________

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 28, 2013 at 12:07am

आदरणीय अजीत आकाशजी, वाह वाह वाह !

आपकी ग़ज़ल के तेवर .. सुब्हान अल्लाह ........

ऐसे ही लिखते रहें

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 26, 2013 at 5:33pm

आदरणीय अजीत शर्मा जी 

देखकर गहरा अंधेरा किसलिए मायूस हो

रात कितनी भी हो लम्बी भोर आयेगी ज़रूर.........बहुत सुन्दर हौसला प्रदान करता शेर ..

बहुत सुन्दर प्रभावशाली क्रान्ति उद्घोष करती ग़ज़ल के लिए हार्दिक शुभकामनाएं ..

कर रही है कर्मचारी हित को अनदेखा तो फिर

तय समझ लो अब ये सत्ता चरमरायेगी ज़रूर.............क्या यहाँ तबाकुले रदीफ़ का ऐब होगा ? या नहीं? 

माँगने से यदि न मिल पाये तो बढ़कर छीन लो...........और कृपया इस मिसरे को बहर में पढने में मेरी मदद करें... क्या 'यदि' को 2 में बांधा गया है?

सादर.

Comment by विजय मिश्र on November 22, 2013 at 5:38pm
आकाशजी! पुरजोर और पुरजोश लिखा है और यह तो संचलन गीत रच दिया आपने | अतिप्रसंशा योग्य रचना | ढेर सारी शुभकामनाएँ और बधाई , सादर |
Comment by अरुन 'अनन्त' on November 22, 2013 at 1:39pm

वाह वाह आदरणीय एक एक शेर पर ढेरों दिली दाद कुबूल फरमाएं बहुत ही शानदार उम्दा ग़ज़ल कही है आपने मजा आ गया

Comment by बसंत नेमा on November 22, 2013 at 12:08pm

आ0 अजीत जी .... बहुत खूब कहा आप ने 

संगठित होकर दिखा दो संगठन में शक्ति है

जो विरोधी शक्ति होगी मुँह की खायेगी ज़रूर

वाकई एक क्रांति सा जोश है  आप की गजल मे ......................... बधाई शुभकामनाये 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 22, 2013 at 11:31am

आदरणीय अजीत जी ..आपके ग़ज़ल वाकई क्रांति लाने वाली ग़ज़ल है ..हर शेर उम्दा , आशावादिता से परिपूर्ण, कहीं आक्रोश दर्शाती है , कही हकीकर से रूबरू करती है , कहीं चेंताव्नी ...सचमुच कमाल के ग़ज़ल ..मेरी तरफ से ढेरों बधाई स्वीकार करें ..सादर 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 22, 2013 at 10:57am

हड़तालियों का हौसला बुलंद करने वाली सुंदर गज़ल की बधाई अजीत भाई। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 21, 2013 at 10:20pm

आदरणीय अजीत शर्मा जी बेहतरीन गज़ल है हर एक शेर दमदार है दिली दाद कुबूल करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 21, 2013 at 6:03pm

आदरणीय अजीत भाई ,!!!!बहुत सुन्दर ,ओजस्वी गज़ल कही है बहुत बधाई !!!!!

इस मिसरे मे -

दुश्मनों का चैन-सुख एक दिन जलायेगी  ज़र --     एक को इक कर लीजिये , मत्रा सही हो जायेगा !!! और ज़रूर केवल ज़र टाइप हो गया है , टंकण की गलती सुधार लें !!!!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 21, 2013 at 3:45pm

क्या बात है सर जी बहुत ही ओजपूर्ण ग़ज़ल कही है आपने

सादर बधाई स्वीकारिये

जय हो

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