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सारे शहर में उग गए मशरूम जमी पर

२२१२     १२१२    २२१    १२२ 

दम भूख से हैं तोड़ते मासूम जमीं पर 

पीकर शराब मस्ती में तू झूम जमी पर

 

बच्चे मनाते फुलझड़ी बिन रो के दिवाली 

पीकर तुझे लगे मची है धूम जमी पर 

अम्बार फरजी डिग्रियों के तूने लगाए 

लटका के अब गले में इन्हें घूम जमी पर 

दो बूँद अश्क जो गिरे आँखों से यूं तेरी 

सारे शहर में उग गए मशरूम जमी पर 

सड़कों पे गर पिया तो पोलिश का भी है पंगा 

बनवा ले झुरमुटों में ही कोई रूम जमी पर 

दिन ढलते शाम होते ही  अद्धा तू  गटक ले 

जन्नत है कैसी हो तुझे मालूम जमी पर 

मासूम लाडले तेरे भटकेंगे गली में 

हो वक़्त से पहले ही न मरहूम  जमी पर 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 4, 2013 at 1:53pm

आशुतोष जी

शराबियो के सम्बन्ध में आपकी  गज़ल  बहुत  अच्छी है i

मुबारकवाद i

Comment by Shyam Narain Verma on December 4, 2013 at 11:40am

आदरणीय डॉ. आशुतोष जी ,
अगर विराम का भी समावेश हो तो और अच्छा होता |
सादर ,

Comment by Shyam Narain Verma on December 4, 2013 at 11:23am
बहुत ही सुन्दर ,  हार्दिक बधाई आपको …………..

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 4, 2013 at 11:20am

बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय डॉ. आशुतोष जी प्रयोग अच्छा लगा l बोलचाल के शब्दों का खूबसूरत प्रयोग किया है आपने बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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