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खेल शब्दो का अजीब नही होता ???

कभी कभी
शब्दो के साथ
खेलने वाले ही

भूल जाते हैं
शब्दो की बाजीगरी
रात-दिन जो
रहते हैं शब्दो के बीच
कभी कभी उनको ही
नही मिलते शब्द
कहने को अपनी बात
जाहिर करने को
अपने जज्बात ....
ऐसा लगता है मानो
रूठ गया हो खुदा भी हमसे 
उनकी ही तरह
जैसे वो रूठे हैं हमसे
सिर्फ कुछ
शब्दो के कारण …
एक ख्याल
बार-बार आता है
मन के छोटे से घर में
कि क्यों नही होता ऐसा
कि जज्बात को
बांधे ही न शब्दो में
भावनाओ का बदला
भावनाओ से ……
जैसे सुना है
एक डायलॉग कि
खून का बदला खून
क्या वैसे ही
नही हो सकता
कि शब्दो की
जरूरत ही न पड़े
तब जब अक्सर
पिघलना चाहती हो
भावनाए  ……
तब जब दर्द
आंसुओ में
घुलना चाहता हो  …
कोई किसी से
मिलना चाहता हो ....
क्यों पड़ती है
जरूरत शब्दो की
मोहबत के दरमियाँ
कुछ ऐसा क्यों नही होता
कि सुन ले एक दिल ही
दूसरे दिल की  दास्ताँ
बिना शब्दो का जाल बुने
क्योंकि अक्सर
ऐसा होता है कि
शब्दो के चक्कर में
फंस जाती हैं भावनाये
ढक जाते हैं जज्बात
आधे झूठ और
आधे सच के नीचे
और तब रह जाता है
इंसान अपने ही शब्दो के
बीच में फंसकर
और तब समझ ही
नही पाता वो कि
आखिर सच क्या है
और झूठ क्या है
वो भावनाएं झूठी थी
या ये शब्द झूठे हैं

खेल शब्दो का
अजीब नही होता ???

स्वयं लिखित व अप्रकाशित रचना
सोनम सैनी

Views: 859

Comment

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Comment by Sonam Saini on December 30, 2013 at 12:35pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सौरभ पाण्डेय सर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 13, 2013 at 11:49pm

रचनाकर्म की सार्थकता है कि तथ्य संप्रषित हं..

बधाई स्वीकारें .. .

Comment by Sonam Saini on December 9, 2013 at 4:13pm

सभी को सोनम का सादर नमस्कार …… आप सभी ने मेरी छोटी सी कोशिश को इतना सराहा इसके लिए मैं दिल से आभारी हूँ और आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद करती हूँ ! रचना की गलतियों को सुधार कर आगे बेहतर लिखने कि कोशिश करूंगी।। धन्यवाद 

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 7, 2013 at 5:07pm

सुन्दर रचना बढ़िया सोच बधाई आपको

Comment by विजय मिश्र on December 7, 2013 at 4:09pm
शब्दों के ही खेल अजीब होते हैं ,शब्दों ने ही महाभारत रचाया था | शब्द अभिव्यक्ति है किन्तु मन्थन कर इसके मूल तक पहुँचने के पश्चात ही व्यक्त हो |रहा प्रेम तो इसके संवाद तो घंटों निःशब्द होते हैं और अभिव्यक्तियाँ उजागर होतीं रहतीं हैं| सुंदर रचना , साधुवाद |
Comment by Parveen Malik on December 7, 2013 at 11:03am
कभी कभी रचना भी इतना दिल को छू जाती है कि तारीफ करने को शब्द ही नहीं मिलते .. शब्दों का ही खेल है !
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 7, 2013 at 8:46am

शब्दो के चक्कर में
फंस जाती हैं भावनाये
ढक जाते हैं जज्बात
आधे झूठ और
आधे सच के नीचे
और तब रह जाता है
इंसान अपने ही शब्दो के
बीच में फंसकर
और तब समझ ही
नही पाता वो कि
आखिर सच क्या है
और झूठ क्या है
वो भावनाएं झूठी थी
या ये शब्द झूठे हैं

,सच! में एक वास्विक सत्य लिए हुयी है, इन्सान अपने जीवन में कई बार शब्दों के भंवर में फस कर रह जाता है, बोखला जाता है, समझ नहीं आता क्या सच है? क्या झूठ ?, आपकी रचना में सुंदरता से चिंतन हुआ है,  हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीया सोनम जी

Comment by Meena Pathak on December 6, 2013 at 2:40pm

बहुत सुन्दर रचना है सोनम जी , बधाई आप को 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 6, 2013 at 2:13pm

बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीया सोनम जी .....सादर बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on December 6, 2013 at 9:28am

सुन्दर चिंतन हुआ है.बधाईयाँ..........

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