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कागज़ पर अंकित नक्शा नही है देश...

उन्हें विरासत में मिली है सीख
कि देश एक नक्शा है कागज़ का
चार फोल्ड कर लो
तो रुमाल बन कर जेब में आ जाये

देश का सारा खजाना
उनके बटुवे में है
तभी तो कितनी फूली दीखती उनकी जेब
इसीलिए वे करते घोषणाएं
कि हमने तुम पर
उन लोगों के ज़रिये
खूब लुटाये पैसे
मुठ्ठियाँ भर-भर के


विडम्बना ये कि अविवेकी हम
पहचान नही पाए असली दाता को

उन्हें नाज़ है कि
त्याग और बलिदान का
सर्वाधिकार उनके पास सुरक्षित है


इसीलिए वे चाहते हैं
कि उनकी महत्वाकांक्षाओं के लिए
हम भी हँसते-हँसते बलिदान हो जाएँ
और उनके ऐशो-आराम के लिए
त्याग दें स्वप्न देखना...
त्याग दें प्रश्न करना...
त्याग दें उम्मीद रखना.....

क्योंकि उन्हें विरासत में मिली सीख
कि टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से
कागज़ पर अंकित
देश एक नक्शा मात्र है....

(मौलिक अप्रकाशित) 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 19, 2013 at 4:54pm

आदरणीय अनवर सुहैलजी, दिल से बधाई स्वीकारे इस कविता के होने लिए.

मात्र शीर्षक पढ़ कर मेरे जैसा कोई पाठक, अवश्य है, कि पूरी कविता के प्रति अन्यमनस्क हो सकता है. कारण, शीर्षक में कविश्रेष्ठ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक अमर कविता से लिया गया जीवन-रक्त है.

लेकिन जैसे ही कविता आगे बढ़ती है, न केवल अपनी सत्ता बनाती चलती है, आखिर तक आते-आते पाठक की सोच को झकझोर डालती है.

इस सशक्त कविता के होने पर बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें, आदरणीय.
सादर

Comment by MAHIMA SHREE on December 13, 2013 at 10:34pm

क्योंकि उन्हें विरासत में मिली सीख
कि टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से
कागज़ पर अंकित
देश एक नक्शा मात्र है....

क्या बात है सर ..जोरदार और धारदार भी ...ढेरो बधाई आपको ...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 12, 2013 at 10:24pm

अच्छी रचना है जनाब अनवर सुहैल साहब बधाई आपको

Comment by annapurna bajpai on December 12, 2013 at 9:15pm

सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई .आ० अनवर जी । 

Comment by Arun Sri on December 12, 2013 at 12:34pm

जोरदार तमाचा है देश का बपौती समझने वालों के मुंह पर साथ ही सर्वसाधारण को झकझोरती भी है !
//देश एक नक्शा है कागज़ का// ..... कहीं गहरे तक धसती पंक्ति ! साधुवाद !

Comment by Priyanka singh on December 11, 2013 at 10:33pm

क्योंकि उन्हें विरासत में मिली सीख 
कि टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से
कागज़ पर अंकित 
देश एक नक्शा मात्र है....

सत्य.....सत्य और सिर्फ सत्य ...शायद यही वजूद रह गया है आज देश का ...उन्हें विरासत में मिली है सीख 
कि देश एक नक्शा है कागज़ का 
चार फोल्ड कर लो
तो रुमाल बन कर जेब में आ जाये...........अद्भुत रचना ....सर बधाई 

Comment by Tapan Dubey on December 11, 2013 at 5:49pm
अनवर भाई बहुत खूब लिखा है वाह

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 11, 2013 at 5:09pm

आदरणीय , सुन्दर रचना के लिये बधाई !!!!!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 11, 2013 at 3:03pm

मित्र सुहैलं जी

बहुत सुन्दर रचना i

त्याग दे स्वप्न देखना/ प्रश्न करना /उम्मीद रखना ----

मेरी बधाइयाँ  i

कृपया ध्यान दे...

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