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राह मे दुश्वारियां थीं जब चले थे घर से हम ( गज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122  2122   2122  212

सिलसिले उनके छिपे, कांटो से भी मिलते गये 

फिर भी ऐसा क्यों हुआ वो फूल सा खिलते गये

 

राह मे दुश्वारियां थीं जब चले थे घर से हम

बिन रुके चलते रहे तो रास्ते मिलते गये 

 

हम भी फौलादी पकड़ रखते थे अपनी बात पर   

प्यार से हमको हिलाया और हम हिलते गये    

 

या तो जादू था किसी का या किसी का ख़ौफ़ था

बोलने वाले सभी के होंठ क्यों सिलते गये  

 

चीज़ क्या है प्यार परवाने बतायेंगे सही

जो शमाँ के पास आये, आग में मिलते गये

लौट के आये  तो पाये कुछ नये ही शख़्स उनमें       

वो सभी जो ख़ुद के भीतर ख़ुद से ही मिलते गये 

***************************************            

मौलिक एवँ अप्रकाशित    ( संशोधित )        

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2013 at 5:34pm

आदरणीया सविता जी , गज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2013 at 5:33pm

आदरनीय सौरभ भाई , गज़ल पर आपकी उत्साह वर्धक प्रितिक्रिया के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2013 at 5:32pm

आदरणीय वीनस भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥ शुतुर्ग़ुर्बा दोष सुधारने के लिये भेज देता हूँ ॥

Comment by savitamishra on December 23, 2013 at 4:57pm

बहुत खुबसूरत


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 12:04am

इस ग़ज़ल प्रयास पर दिली दाद कुबूल कीजिये, आदरणीय.

आखिरी शेर में ऐबे शुतुर्ग़ुर्बा है.. वीनस भाई ने भी यही इशारा किया है..

शुभ-शुभ

Comment by वीनस केसरी on December 17, 2013 at 3:25am

सुन्दर ग़ज़ल कही है ये शेर खूब पसंद आया ...

या तो जादू था किसी का या किसी का ख़ौफ़ था

बोलने वाले सभी के होंठ क्यों सिलते गये 


सानी मिसरा में वो सभी के कारण आपको पहले मिसरे में भी बहुवचन का प्रयोग करना था ,,  नया ही शख़्स था   के कारण एक वचन हो जा रहा है

लौट के आये  तो उनमें  भी नया ही शख़्स था    

वो सभी जो ख़ुद के भीतर ख़ुद से ही मिलते गये

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 16, 2013 at 7:43pm

आदरणीय संजय भाई , गज़ल पर आपकी उपस्थिति ने गज़ल का मान बढ़ा दिया , सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया !

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on December 16, 2013 at 5:50pm

खूबसूरत गज़ल हुई आदरणीय गिरिराज भाई जी...

सादर बधाई स्वीकारें...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 15, 2013 at 6:38pm

आदरणीय श्याम भाई , गज़ल की सराहना के लियेआपका हार्दिक आभार ॥

Comment by Shyam Narain Verma on December 14, 2013 at 11:26am
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.

कृपया ध्यान दे...

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