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जब इबादत से न कोई रास्ता मुझको मिलेगा - गज़ल ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122      2122     2122

 

ले   धनक  से  रंग  रंगोली    बना   ले  तू   खुशी  से

बेरहम   है   ये   जहाँ   क्यों   मांगता   है   आदमी से ॥

 

तेरे   ग़म   तेरे    ही  हैं   ये मानता  तू  क्यों   नहीं है

कब   तलक   सोये  रहेगा   जाग जा  अब  बेखुदी से ॥

 

जो ज़ुबाँ   रखते हैं  वो, चुप्पी   सभी ओढ़े   मिले  तो  

बेज़ुबाँ    कोई    मिले    तो    पूछ  उनकी   खामुशी  से ॥

 

कुछ मुझे तू ,कुछ तुझे मै, आ समझ लें बैठ संग में

कुछ        पाया है    किसी ने   बेवज़ह रस्साकशी से ॥

 

जब    इबादत से       कोई   रास्ता  मुझको मिलेगा  

तब    सहारा  माँग लूंगा मै भी इक दिन मयकशी से ॥

 

सब्र  थोड़ा, थोड़ी  रहमत हो  ख़ुदा  की, सब  मिलेगा 

इस तरह  कुछ भी  न पाया है  किसी ने सरकशी से ॥

****************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित ( संशोधित )

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 5, 2014 at 6:43am

आदरणीय नादिर खान भाई , ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 5, 2014 at 6:42am

आदरणीय बैद्य नाथ भाई , ग़ज़ल पर आपकी उत्साह वर्धन करती प्रतिक्रिया के लिये , और दो शे र पसन्द करने के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥

Comment by नादिर ख़ान on January 4, 2014 at 10:44pm

कुछ मुझे तू ,कुछ तुझे मै, आ समझ लें बैठ संग में

कुछ        पाया है    किसी ने   बेवज़ह रस्साकशी से ॥

आदरणीय गिरिराज जी बहुत उम्दा शेर कहा आपने, बहुत पसंद आया ।

Comment by Saarthi Baidyanath on January 4, 2014 at 9:59pm

तेरे   ग़म   तेरे    ही  हैं   ये मानता  तू  क्यों   नहीं है

कब   तलक   सोये  रहेगा   जाग जा  अब  बेखुदी से ॥.....बहुत ही खुलुसी शेर ..उम्दा है मान्यवर , इस शेर के क्या कहने 

जब    इबादत से       कोई   रास्ता  मुझको मिलेगा  

तब    सहारा  माँग लूंगा मै भी इक दिन मयकशी से ॥.....हसीनतर..:)


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 4, 2014 at 9:51pm

आदरणीय विजिश भाई , सराहना के लिये आपका बहुत आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 4, 2014 at 9:50pm

आदरणीय सौरभ भाई , ग़ज़ल पर आपकी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया के लिये आभारी हूँ ॥

Comment by M Vijish kumar on January 4, 2014 at 6:15pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय अंकल जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 1:32am

बढिया ग़ज़ल हुई है..

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2013 at 10:27pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई , गज़ल की सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 17, 2013 at 10:20pm

बहुत बेहतरीन गजल , यह शेर खास पसंद आया दिली दाद कुबूल कीजिये आदरणीय गिरिराज जी

कुछ मुझे तू ,कुछ तुझे मै, आ समझ लें बैठ संग में

कुछ        पाया है    किसी ने   बेवज़ह रस्साकशी से ॥

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