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जब इबादत से न कोई रास्ता मुझको मिलेगा - गज़ल ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122      2122     2122

 

ले   धनक  से  रंग  रंगोली    बना   ले  तू   खुशी  से

बेरहम   है   ये   जहाँ   क्यों   मांगता   है   आदमी से ॥

 

तेरे   ग़म   तेरे    ही  हैं   ये मानता  तू  क्यों   नहीं है

कब   तलक   सोये  रहेगा   जाग जा  अब  बेखुदी से ॥

 

जो ज़ुबाँ   रखते हैं  वो, चुप्पी   सभी ओढ़े   मिले  तो  

बेज़ुबाँ    कोई    मिले    तो    पूछ  उनकी   खामुशी  से ॥

 

कुछ मुझे तू ,कुछ तुझे मै, आ समझ लें बैठ संग में

कुछ        पाया है    किसी ने   बेवज़ह रस्साकशी से ॥

 

जब    इबादत से       कोई   रास्ता  मुझको मिलेगा  

तब    सहारा  माँग लूंगा मै भी इक दिन मयकशी से ॥

 

सब्र  थोड़ा, थोड़ी  रहमत हो  ख़ुदा  की, सब  मिलेगा 

इस तरह  कुछ भी  न पाया है  किसी ने सरकशी से ॥

****************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित ( संशोधित )

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2013 at 5:56pm

आदरणीय राजेश भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2013 at 5:47pm

आदरणीय वीनस भाई आपका शुक्रिया , मै अभी तक व्याकरण की गलती ही खोज रहा था , मै अभी बह्र ठीक कर लेता हूँ ॥ आपका शुक्रिया ।

Comment by वीनस केसरी on December 17, 2013 at 4:54pm

2122     2122      2122     2122

वो  ज़ुबाँ   रख/ ते   जो , चुप्पीसभी ओ / ढ़े   मिले  तो 

आदरणीय मिसरा बेबहर है

Comment by राजेश 'मृदु' on December 17, 2013 at 4:41pm

सब्र  थोड़ा, थोड़ी  रहमत हो  ख़ुदा  की, सब  मिलेगा 

इस तरह  कुछ भी  न पाया है  किसी ने सरकशी से ॥

बहुत सुंदर भाव आपने उकेरे हैं आदरणीय, सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2013 at 3:36pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल भाई , आपकी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2013 at 3:35pm

आदरणीय उमेश भाई , सराहना और उत्साह वर्धन क्रे लिये आपका आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2013 at 3:34pm

आदरणीय वीनस भाई , मिसरे पर आपका इशारा समझने के प्रयास मे हूँ , अगर आपको उचित लगे तो आप बता दें , अब तक नही समझ पाया हूँ । इशारे के लिये आपका शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2013 at 3:32pm

आदरनीय राम भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2013 at 2:42pm

मित्रानुज

अति सुन्दर i साधुवाद i बेहतरीन गजल i

बेवजह रस्साकशी -----  क्या बात है ?

Comment by umesh katara on December 17, 2013 at 11:06am

वाह वाह अच्छी गज़ल पढने को मिली बधायी हो सर

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