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ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

ग़ज़ल
बहर-।ऽऽऽ ।ऽऽऽ
.
कभी ख़ुद से रफ़ाक़त हो।
ज़रा शिकवा-शिकायत हो॥
.
ख़ुशी के साज़ खो जाएँ,
बड़ी बोझिल तबीयत हो।
.
अदाओं में हो बेअदबी,
निगाहों में हिक़ारत हो।
.
कसकती हों कहीं टीसें,
कहीं बेजा हरारत हो।
.
सरे-बाज़ार लुट जाएँ,
ज़रा ऐसी तिजारत हो।
.
दुआ के चार बोलों में,
अनुष्टुप हो न आयत हो।
.
डगर लंबी,सफ़र तन्हा,
यही अपनी विरासत हो।
.
ग़ज़ल में ढल सकें आँसू,
फ़क़त इतनी इनायत हो॥
.
-मौलिक एवं अप्रकाशित।
-24.12.2013

Views: 745

Comment

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Comment by Ravi Prakash on January 5, 2014 at 4:20pm
ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया आदरणीय।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on January 4, 2014 at 8:12pm
दुआ के चार बोलो में।
अनुष्टुप हो न आयत हो।
वाह आदरणीय भाई रवि प्रकाश जी! वाह!
एक बेहतरीन गजल के लिये बधाई।
Comment by Ravi Prakash on January 3, 2014 at 1:30pm
सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद आ॰ सौरभ जी। आशीर्वाद बनाए रखें॥

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 3, 2014 at 2:37am

ग़ज़ल पर हुआ प्रयास मनोहारी है.

दुआ के चार बोलों में,
अनुष्टुप हो न आयत हो.. इस शेर के ग़िर्द बुनी गयी ग़ज़ल भली लगी, रवि भाईजी.

हार्दिक बधाई.

Comment by Ravi Prakash on December 30, 2013 at 4:42pm
ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया कुंती जी।
Comment by coontee mukerji on December 29, 2013 at 10:54pm

दुआ के चार बोलों में,
अनुष्टुप हो न आयत हो।.....क्या बात है.
.

Comment by Ravi Prakash on December 28, 2013 at 7:43pm
आ॰ गीत जी, आपको रचना अच्छी लगी, जान कर मन को आनंद प्राप्त हुआ। स्नेह बनाए रखें।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 28, 2013 at 9:01am

सरे-बाज़ार लुट जाएँ,
ज़रा ऐसी तिजारत हो|
.
डगर लंबी,सफ़र तन्हा,
यही अपनी विरासत हो।

बहुत शानदार गजल कही आपने आदरणीय रवि जी, यह शेर बहुत पसंद आये बधाई आपको

Comment by Ravi Prakash on December 27, 2013 at 11:03pm
धन्यवाद महिमा जी.. बधाई प्राप्त की गई है।
Comment by MAHIMA SHREE on December 27, 2013 at 7:45pm

दुआ के चार बोलों में,
अनुष्टुप हो न आयत हो।... वाह बहुत बढ़िया आ. रवि प्रकाश जी बधाई प्रेषित है ..

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