For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

बह्र-ए- खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
2122 1212 22

इश्क में डूब इन्तहाँ कर ली,
यार मुश्किल में अपनी जाँ कर ली,

भा गई सादगी अदा हमको,
जल्दबाजी में हमने हाँ कर ली,

वश में पागल ये दिल नहीं अब तो,
धडकनें छेड़ बेलगाँ कर ली,

पाँव जख्मी लहू से लथपथ हैं,
राह ने ठोकरें जवाँ कर ली,

नाम बदनाम हो न महफ़िल में,
शायरी मैंने बेजबाँ कर ली..

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 1198

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by ajay sharma on January 5, 2014 at 10:53pm

नाम बदनाम हो न महफ़िल में, 
शायरी मैंने बेजबाँ कर ली..,,,,,,,,,,

shayari ....maine be-z"u"ban .....ya be-z"a" ban ....sahi hai ....kriypa margdarshan kare ..........

Comment by ajay sharma on January 5, 2014 at 10:48pm

भा गई सादगी अदा हमको,
जल्दबाजी में हमने हाँ कर ली,   kuch clear  nahi lag raha  hai .....sadgi ada ......

Comment by vandana on January 5, 2014 at 9:55pm


Delete Comment

आदरणीय शिज्जू जी मैंने आपकी जानकारी को चैलेन्ज नहीं किया मैनें नेट पर उपलब्ध सामग्री के बारें में लिखा था फिर भी मेरे शब्दों से आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए आपसे माफ़ी चाहती हूँ जहाँ तक जानकारी का सवाल है उसके लिए आपके नजरिये का सम्मान करती हूँ बात साफ़ होनी ही चाहिए वाणी प्रकाशन की पुस्तकों में आपने जैसा उद्धृत किया वैसा ही है मैंने भी देखा है 

और बहस वाली बात भी आपको लेकर नहीं लिखी पर आदरणीय अरुण जी की  पोस्ट पर मेरी टिप्पणी से  किसी को ( खासतौर से खुद आदरणीय अरुण जी को ) कष्ट पहुँचाने की जो  शुरुआत हुई उसके लिए केवल मैं जिम्मेदार हूँ  उसीके लिए क्षमाप्रार्थना की थी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 5, 2014 at 9:52pm

भाई अरुण जी, "इन्तहाँ" शब्द गलत है, सही शब्द है "इंतिहा". 

अगर "बेलगाँ" को "बे-लगाम" की जगह प्रयोग किया गया है तो वह भी गलत है, क्योंकि व्यंजन "म" को चन्द्रबिन्दु से स्थानापन्न नहीं किया जाता है, यह छूट केवल व्यंजन "न" से ख़त्म होने वाले शब्द के साथ ही ली जा सकती है.

Comment by Sarita Bhatia on January 5, 2014 at 9:05pm

अरूण एक तो गजल में जाँ मुश्किल में कर ली और दूसरा गजल लिख कर ऐसा लग रहा है 

बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 5, 2014 at 7:42pm

वंदना जी ये बहस वाली बात नही है कोई न कोई शंका हर किसी के मन में होती है बात साफ होनी ज़रूरी है, रही बात जानकारी के अभाव की जी हाँ आप सही हैं मेरे पास जानकारी का अभाव तो है ये स्वीकार करने में कोई हिचक नही है जो सच वो सच है, जो भी जानकारी मुझे मिली है वो बहुत ओबीओ से ही मिली है कुछ उस्तादों की गज़लों से।
अब जिगर मुरादाबादी का शेर उस किताब से मैंने लिया है जिसका संपादन जनाब निदा फाज़ली द्वारा किया गया है
हिजाबे इश्क़ को ऐ दिल बहुत गनीमत जान
रहेगा क्या जो ये पर्दा भी दर्मियाँ न रहा

ये वाणी प्रकाशन की किताब है पहले वाली राजपाल एण्ड संस की


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 5, 2014 at 7:30pm

वंदनाजी ये शेर मैंने बशीर बद्र जी के ग़ज़ल संग्रह धूप का चेहरा से निकाला है एक और उदाहरण है इन्हीं का

हज़ार साल का किस्सा तमाम होता है
ज़मीं का एक वरक़ आसमाँ ने मोड़ दिया
इस किताब का संपादन श्री कन्हैया लाल नंदन जी द्वारा किया गया है

Comment by vandana on January 5, 2014 at 6:40pm

आदरणीय शिज्जू जी आपने जो उदाहरण दिया है वो बिलकुल ठीक है काफिये में मूल शब्द का आना जरूरी नहीं  बस कमान शब्द को कमां लिखा जाना चाहिए न कि कमाँ यह टंकण त्रुटि हो सकती है या जानकारी का अभाव भी अगर आपने यह उदाहरण नेट पर देखा है तो कृपया ग़ज़ल की किसी पुस्तक में भी देखिये और बताइयेगा 

जैसे राही मासूम रजा साहब की ग़ज़ल में -

जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं

शाखे गुल कैसे हैं खुश्‍बू के मकां कैसे हैं ।।

 

ऐ सबा तू तो उधर से ही गुज़रती होगी

उस गली में मेरे पैरों के निशां कैसे हैं ।।

 

कहीं शबनम के शगूफ़े कहीं अंगारों के फूल

आके देखो मेरी यादों के जहां कैसे हैं ।।

जहाँ और जहां में अंतर है यह बात कहना चाहती थी और(काफिया - मूल शब्द - लिखा जा सकता है)यहाँ  काफिया (जो लिया गया )उसका मूल शब्द क्या है और चन्द्र बिंदु का प्रयोग न करते हुए कैसे लिखा जाना चाहिए यह बात उसके  नीचे दिए गए  उदाहरणों के माध्यम से व्यक्त करना इसका उद्देश्य था| 

वैसे टिप्पणी करते हुए सहज और सरल भाषा का प्रयोग करना चाहिए उसमें न चाहते हुए भी कमी रह जाती है

अपनी  भाषा या टिप्पणी से आदरणीय अरुन शर्मा 'अनन्त'   जी को आहत किया हो तो क्षमाप्राथी हूँ

आपकी पोस्ट को बहस का मंच नहीं बनाना चाहती थी पर इन बातों  को लेकर यदि मेरी ग़लतफ़हमी है तो दूर होनी चाहिए आपसे पुन: एक बार क्षमा चाहती हूँ  

Comment by annapurna bajpai on January 5, 2014 at 4:47pm

बहुत खूबसूरत गजल हुई है प्रिय अरुण , बधाई । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 5, 2014 at 11:06am

आदरणीया वंदना जी //काफिया - मूल शब्द - लिखा जा सकता है// शायद यहाँ आपके कहने का मतलब है कि काफिया मूल शब्द होना चाहिये?
बशीर बद्र जी की एक ग़ज़ल का मतला देखिये
//रात की राह में तारों की कमाँ रोशन है
चाँद में कौन है ये किसका मकाँ रोशन है//
यहाँ कमान को कमाँ, मकान को मकाँ लिखा गया है

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15
जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Aug 10
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service