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समझ ये क्यूँ नहीं आती..

है क्यूँ खामोश दरिया ये जो कल तक शोर करता था,
उदासी झील की शायद इसे देखी नहीं जाती.
तेरी खामोशियों के लफ्ज जब कानों में पड़ते हैं.
ये सांसें रोक लूं पर धडकनें रोकी नहीं जातीं.
अँधेरी रात से मिलना उजाले की भी ख्वाहिश है,
मगर किस्मत यहाँ ऐसी कभी शय ही नहीं लाती.
तमन्ना रह गई हर बार उसके पास जाने की,
कभी हम खुद नहीं जाते कभी वो ही नहीं आती.
मेरा जब नाम उसके लब को छूता है तो मत पूछो,
धडकता है ये दिल कब तक मुझे गिनती नहीं आती.
मोहब्बत में 'अतुल' तेरा यही अंजाम होना था,
वफ़ा मिलती नहीं सबको समझ ये क्यूँ नहीं आती..
                           — मौलिक व अप्रकाशित.

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Comment by atul kushwah on January 17, 2014 at 9:12pm

आ.रमेश जी, इस बच्चे का उत्साह बढाने के लिए हार्दिक आभार। सादर— अतुल

Comment by रमेश कुमार चौहान on January 17, 2014 at 8:41pm

शब्द एवं भाव अच्छे है, गुरूजनों के सलाह पर अवश्य ध्यान दे । इस प्रस्तुति के लिये बधाई

Comment by Savitri Rathore on January 17, 2014 at 7:44pm

तेरी खामोशियों के लफ्ज जब कानों में पड़ते हैं.
ये सांसें रोक लूं पर धडकनें रोकी नहीं जातीं.
वाह.… बहुत खूब अतुल जी !

Comment by atul kushwah on January 16, 2014 at 11:09pm

Adarneeya Ajay ji, Annapurna ji, Giriraj ji, Coontee ji and Saurabh sir...hausala badhane aur margdarshan ke liye aabhar...Sadar...Atul


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2014 at 10:40pm

रुमानी भावों को शब्दबद्ध करने का साग्रह प्रयास हुआ है. विधान आदि के प्रति भी आग्रही हों, रचनाओं की सार्थकता बढ़ेगी. 

शुभकामनाएँ.

Comment by coontee mukerji on January 16, 2014 at 10:12pm

बहुत सुंदर......

है क्यूँ खामोश दरिया ये जो कल तक शोर करता था,
उदासी झील की शायद इसे देखी नहीं जाती.
तेरी खामोशियों के लफ्ज जब कानों में पड़ते हैं.
ये सांसें रोक लूं पर धडकनें रोकी नहीं जातीं.
अँधेरी रात से मिलना उजाले की भी ख्वाहिश है,....हार्दिक बधाई.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 16, 2014 at 10:01pm

आदरणीय अतुल भाई , सुन्दर गज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥ आदरणीय बह्र लिख देने से हम सीखने वालों को समझने मे आसानी होती है ॥

Comment by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 6:43pm

सुंदर गजल , बधाई आपको । 

Comment by ajay sharma on January 15, 2014 at 11:02pm
तेरी खामोशियों के लफ्ज जब कानों में पड़ते हैं.
ये सांसें रोक लूं पर धडकनें रोकी नहीं जातीं.
wah wah..........................

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