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समृद्ध अतीत के माथे पर
अक्सर खिंच जाती हैं लकीरें
चिंतित भविष्य की
फैसलों की फर्श पर
क्यूं अक्सर
बिखर जाते हैं
बदलाव के मोती
खुशियों के आंगन में
टंगे मुस्कुराते गुब्बारों
पर अक्सर कोई चलाता है
गमों की गोलियां
बेवक्त पर काम आने वाला वक्त
अक्सर बदल जाता है आदमी की तरह
जब मौज मौसम की लेने निकलें तो
थम जाती हैं सुहानी हवाएं अक्सर
समझ आती है जब तलक हमको
नासमझी के कई काम हो जाते हैं,
जब तलक ढूंढ़ पाता हूं
वहीं और तमाम खो जाते हैं
अक्सर हम ख्वाबों की मानिंद
जमीं की जद पार कर जाते हैं
ऐसा भी कभी होता है कि
गम जागते रहते हैं और
हम सो जाते हैं।। 
- मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 2:16am

आपकी प्रस्तुतियों पर पाठकों द्वारा मिली प्रशंसा के साथ-साथ आपको सार्थक सुझाव भी मिले हैं.  आप सुझावों को हृदयंगम कर आगे प्रयासरत हों. आपकी संप्रेषणीयता सार्थक और स्पष्ट होती जायेगी.

शुभ-शुभ

Comment by कल्पना रामानी on December 19, 2013 at 9:22pm

गहन चिंतन की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है आपकी रचना में, आदरणीय अतुल जी हार्दिक बधाई  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 18, 2013 at 4:06pm

खुशियाँ और गम ज़िंदगी में साथ साथ ही चलते हैं...इंसान दो छोरों के बीच अक्सर झूला करता है.. और ये परिवर्तन इतने अनायास होते हैं कि ट्रांजिशन मूमेन्ट्स पता ही नहीं चलते... इस भाव को बहुत सही अभिव्यक्ति मिली है..

फिर भी इस प्रस्तुति में स्पष्टता के लिए कई जगह अल्पविराम का प्रयोग किया जाना था....

समृद्ध अतीत के माथे पर
अक्सर खिंच जाती हैं लकीरें
चिंतित भविष्य की.......................यह तर्क कुछ समझ नहीं आया; वर्तमान के माथे पर तो लकीरें समझ आती हैं, लेकिन अतीत के पन्नों में इस समय लकीरें खिंचना  वो भी भविष्य को लेकर ..यह मुझे स्पष्ट नहीं हो रहा ..कैसे?
.
फैसलों की फर्श पर................फैसलों के फर्श पर (फैंसलों को स्त्रीलिंग संज्ञा नहीं मान सकते..यह पुल्लिंग बहुवचन संज्ञा है )
क्यूं अक्सर...........................क्यूं का सही प्रारूप 'क्यों' है 
बिखर जाते हैं
बदलाव के मोती

बेवक्त पर काम आने वाला वक्त.....................बेवक्त पर काम आने की जगह सिर्फ //बेवक्त काम आने वाला वक़्त //लिखें तो ?
अक्सर बदल जाता है आदमी की तरह

जब तलक ढूंढ़ पाता हूं
वहीं और तमाम खो जाते हैं..............यह पंक्ति भी कुछ और स्पष्टता चाहती है 

फिलहाल कुल मिला कर एक बहुत सुन्दर प्रयास हुआ है.. जिस हेतु बहुत बहुत शुभकामनाएं स्वीकार करें आ० अतुल कुशवाह जी.

Comment by atul kushwah on December 17, 2013 at 5:59pm

आदरणीय सुशील जी, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, मीना जी, गिरिराज जी और भाई राजेश जी... .... आपका सबका आशीर्वाद बना रहे यही कामना है।.... आप सबका स्‍नेह अमूल्‍य और अप्रतिम है। सादर अतुल

Comment by राजेश 'मृदु' on December 17, 2013 at 4:53pm

बहुत बढि़या, बहुत ही बढि़या, आदरणीय अतुल जी, आपका रचनाकर्म स्‍वस्तिकारी है, साथ चलते रहें, सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2013 at 3:50pm

आदरणीय , सुन्दर रचना के लिये आपको बधाई ॥

Comment by Meena Pathak on December 17, 2013 at 3:08pm

बहुत सुन्दर रचना .. बधाई आप को 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2013 at 2:53pm

कुशवाह जी

अक्सर ऐसा ही होता है  i न जाने क्यों ?

 

न जाने तड़प तड़ित  से कौन  ?

निमंत्रण  देता  मुझको  मौन i ----------------- बधाई स्वीकार करे i

Comment by Sushil Sarna on December 17, 2013 at 1:44pm

sundr bhavabhivyakti

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