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दुर्मिल सवैया - दो छंद

हर बार यही दिल बोल रहा , उनका पिय जो अब मीच जली 
अपना अपराध नहीं कुछ था,फिर भी कहि कै तुम नीच जली  
उस राह सिवाय विकल्प नहीं, बन प्रेम धरा इहि कीच जली 
हमसे वह क्यूँ टकराय गयी , इहि कारन टोकरि बीच जली 
+++++++++++++++++++++++++++++++++++++

खनकी,झनकी,लिपटी मुझसे पियकी चुटकी चटकी सि भली   

हलकी फुलकी छलकी बलकी, ठुमकी सिमटी सलकी सि कली 

अछरी, लहरी गहरी उमरी ,  अंधरी बिजुरी धुंधरी सि गली 
निकरी निय टोकरि प्रेम पिया, केहि कारण टोकरि बीच जली 
आशीष (सागर सुमन)
मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 30, 2014 at 4:37pm

वर्णिक प्रयास तो उचित है और सुझाव भी बहुत सटीक दिये हैं  अरुन अनन्त भाई ने.

लेकिन मैं कथ्य को ही ले कर भ्रमित हूँ कि रचनाकार आखिर कहना क्या चाहते हैं !

शुभेच्छाएँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 22, 2014 at 9:12pm

आदरणीय आशीष भाई , सुन्दर छंद रचना के लिये आपको बधाई ॥

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 22, 2014 at 2:53pm

आशीष भाई दुर्मिल सवैया पर अच्छा प्रयास है प्रयासरत रहें सुधार हो जायेगा कुछ त्रुटियाँ हैं जो इंगित कर रहा हूँ.

अंधरी और धुंधरी की मात्रा २१२ होती हैं इन्हें अँधरी और धुँधरी करने से ठीक हो जायेगा.

निकरी निय टोकरि प्रेम पिया, केहि कारण टोकरि बीच जली .. इस पंक्ति में मात्रा ठीक नहीं है नियमानुसार पुनः देख लें.

Comment by Ashish Srivastava on January 21, 2014 at 10:51pm
Comment by Ashish Srivastava on January 21, 2014 at 10:51pm

maine pehli baar in chhando ki likha hai koi shilp par apni tippani karke kuch trutiyan batayeihn ji 

Comment by Shyam Narain Verma on January 21, 2014 at 4:58pm
बहुत सुंदर भाव, बधाई....

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