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जाने कैसे कैसे मंजर देखे है - गजल

बहर  : २ २ २ २ / २ २ २ २/ २ २ २ 
चोरी से अश'आर उठाकर देखे है 
रोज बनाते कविता सागर देखे है 
अक्सर लोग उठाते कंकर देखे है 
हमने विष पीते प्रलयंकर देखे है  
जिनको लिख के पढ़ के छोड़ दिया था 
आवाज लगाते वो अक्षर देखे है 
अभिमान भरे मस्तक भी ऊँचे तो क्या  
हमने घुटने टेके अकबर देखे है 
जो सब खुद को सच्चा साफ़ बताते हैं  
वो रिश्वत मांग रहे अफसर देखे है 
तुमको वो बेईमान समझते क्यूँ है 
हमने श्रापों से पीड़ित वर देखे है 
इस छोटी सी दुनिया में तुमने सागर 
जाने कैसे कैसे मंजर देखे हैं 
सागर सुमन 
मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 599

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 13, 2014 at 3:12pm

वाह  ! बहुत खूब !

यों, थोड़ी और संप्रेषणीयता कमाल कर गयी होती.

जिनको लिख के पढ़ के छोड़ दिया था.. . एक गाफ़ या दो मात्रायें कम हैं.

Comment by Ashish Srivastava on May 12, 2014 at 10:10pm

आप सभी सुधि जानो को उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत आभार 

Comment by Satyanarayan Singh on May 3, 2014 at 12:58pm

शानदार ग़ज़ल हेतु हार्दिक बधाई

Comment by gumnaam pithoragarhi on April 30, 2014 at 5:25pm

बहुत बढ़िया बधाई आपको,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 29, 2014 at 5:27pm

आदरणीय , अच्छी गज़ल कही , बहुत बहुत बधाई !!

Comment by रमेश कुमार चौहान on April 29, 2014 at 2:27pm

 बहुत ही सुंदर आदरणीय बधाई

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 29, 2014 at 1:23pm

बहुत बढ़िया गजल हुई आदरणीय आशीष जी, हर एक अश'आर सच्चाई को बयां करता हुआ. हार्दिक बधाई आपको

Comment by वीनस केसरी on April 28, 2014 at 9:03pm

बहुत खूब


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 28, 2014 at 12:30pm

बहुत खूब जनाब बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये

कृपया ध्यान दे...

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