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आत्म-धन - (विजय निकोर)

आत्म-धन

 

होगी ज़रूर कोई गहरी पहचान

दर्द की तुम्हारे इस दर्द से मेरे

कि जाने किन-किन तहों से उभरती

छटपटाती

लौट आती है वही एक याद तुम्हारी

यादों के कितने घने अँधियाले

पेड़ों के पीछे से झाँकती ...

मैंने तो कभी तुमको

इतना स्नेह नहीं दिया था

भीगी आँखों से, हाँ,

भीगी आँखों को देखा था

कई बार... खड़े-खड़े ...  चुपचाप

 

पंख कटे पक्षी-सा तड़पता

ठहर नहीं पाता है मन पल-भर कहीं

तुम्हारा .... न मेरा

सुलगती है ऐसे में आग नित्य अकस्मात

अर्थहीन असंतोष की

कुछ जल्दी मुरझा जाता है हर दिन हमारा

झुक आती है झट पहचानी साँझ संवलाई

और उभर-उभर आते हैं

कितने नए-नए सवालों के अनजाने कर्ज़ 

भीतरी अँधेरे भयानक वीरानों से

कई घने पुराने कितने

बड़े-बड़े  दर्द

 

... मेरे आत्म-धन

 

                 -------

                                        --- विजय निकोर

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment

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Comment by vijay nikore on January 30, 2014 at 1:19pm

//ह्रदय में अन्दर तक उतरती हुई बहुत ही गहराई लिए हुए अत्यंत उत्कृष्ट कविता//

आपकी सराहना ने मेरे प्रयास को सार्थकता दी है। हार्दिक आभार आदरणीय राहुल जी।

Comment by vijay nikore on January 30, 2014 at 1:17pm

//अमूर्तता को जीने का साहस देती हुई आपकी भावपूर्ण रचना को कई बार पढ़ा।

पता नहीं रचना गहराई तक मैं पहुंच पाई कि नहीं लेकिन पढकर सुखद अनुभूति हुई।//

आदरणीया वंदना जी, आप सदैव रचनाओं को अनूठी सूक्षम दृष्टि से पढ़ती हैं, अत:

रचना की गहराई  तक पहुँचती हैं। सराहना के लिए हार्दिक आभार।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 30, 2014 at 9:37am

कितने नए-नए सवालों के अनजाने कर्ज़ 

भीतरी अँधेरे भयानक वीरानों से

कई घने पुराने कितने

बड़े-बड़े  दर्द

.. मेरे आत्म-धन

अंतर्वेदना को बहुत गहरे भाव मिले, मौन रहकर भी सब कुछ बयां करती पंक्तियाँ , बधाई स्वीकारें आदरणीय विजय जी

 

 

Comment by vijay nikore on January 30, 2014 at 8:26am

//कविता का मौन जाने किस किस गहराइयों में जीता है प्रेम को , समर्पण को , पीड़ा को//

कविता के भावों के अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय अरुन जी।

 

सादर,

विजय निकोर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 22, 2014 at 8:11pm

आदरणीय विजय निकोर सर बेहतरीन रचना है बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये
सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 22, 2014 at 7:06pm

मधुर समबनधोन के दर्द को दिल मे छुपाये गहरि अनुभुतियो से रचि रचना के लिये बहुत बहुत बधाइ आदरनिय 

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 22, 2014 at 2:43pm

आदरणीय विजय निकोर सर समर्पण भाव का हृदयस्पर्शी चित्रण बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 22, 2014 at 6:41am

आदरणीय बड़े भाई , अनकहे प्रेम की गहरी अनुभूतियों की झलक देती  सुन्दर रचना के लिये  बहुत बधाई.

पंख कटे पक्षी-सा तड़पता

ठहर नहीं पाता है मन पल-भर कहीं

तुम्हारा .... न मेरा

मन के कसक की अदभुत अभिव्यक्ति


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on January 22, 2014 at 2:20am

//सुलगती है ऐसे में आग नित्य अकस्मात

अर्थहीन असंतोष की//.....//कितने नए-नए सवालों के अनजाने कर्ज़ 

भीतरी अँधेरे भयानक वीरानों से

कई घने पुराने कितने

बड़े-बड़े  दर्द

 

... मेरे आत्म-धन//  श्रद्धेय, अप्रतिम है आपकी सोच इन पंक्तियों में. आपकी सभी रचनाओं में अनकही दार्शनिकता रचना के स्तर को एक अनुपम आकाश प्रदान करती है. यहाँ भी कोई व्यतिक्रम नहीं है. अंतस को बड़ी तृप्ति मिली. शतेक नमन.

Comment by Priyanka singh on January 21, 2014 at 6:18pm

मैंने तो कभी तुमको

इतना स्नेह नहीं दिया था

भीगी आँखों से, हाँ,

भीगी आँखों को देखा था

कई बार... खड़े-खड़े ...  चुपचाप

कुछ रिश्तों में लेन-देन जरुरी नहीं होता शायद .....बस महसूस करना उसके होने को ....यही उसके मायने होते है .....हर शब्द दिल से गुज़र गया .....लाजवाब ...बहुत खूबसूरत और भावनाओं से लबरेज़ रचना के दिल हार्दिक बधाई सर .......

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