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साथी! तोड़ न निर्दयता से चुन चुन मेरे पात...

नन्हीं एक लता मैं  निर्बल,
मेरे पास न पुष्प न परिमल,
मेरा सञ्चित कोष यही बस,
कुछ पत्ते कुम्हलाये कोमल,
तोड़ न दे यह शाख अकिञ्चन, निर्मम तीव्र प्रवात...

मैं हर भोर खिलूँ मुस्काती,
पर सन्ध्या आकुलता लाती,
साँस साँस भारी गिन गिन मैं,
रजनी का हर पहर बिताती,
एक नये उज्ज्वल दिन की आशा, मेरी हर रात...

पड़ती तेरी ज्वलित दृष्टि जब,
भीत प्राण भी हो जाते तब,
सहमी सकुचायी मैं कहती-
यह दुर्लभ सौभाग्य मिले कब,
मेरी भी काया हो जिस दिन मलय-सुवासित-स्नात...

-मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by mohinichordia on January 26, 2014 at 2:25pm

एक नये उज्जवल दिन की आशा , मेरी हर रात...   दुर्बल मन की सोच,  दोनों तरफ   मेरी भी काया हो जिस दिन मलय- सुवासित -स्नात .बहुत सुन्दर शब्दों से सजी रचना  

Comment by अजय कुमार सिंह on January 26, 2014 at 2:15am

अरुन शर्मा 'अनन्त' जी, Maheshwari Kaneri जी, Arun Srivastava जी, laxman dhami जी, vandana जी, annapurna bajpai जी, गिरिराज भंडारी जी एवं शिज्जु शकूर जी - मेरे प्रयास को स्नेह देने हेतु आप सभी गुणीजनों का हार्दिक आभारी हूँ.

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 24, 2014 at 11:07am

अजय भाई वाह बहुत ही सुन्दर गीत रचा है आपने पढ़कर दिल खुश हो गया शब्द चुनाव बहुत ही सुन्दर है हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Maheshwari Kaneri on January 23, 2014 at 3:24pm
नहुत ही सुकोमल गीत ..अजय कुमार जी..
Comment by Arun Sri on January 23, 2014 at 11:09am

एक पुरुष द्वारा ऐसे सुन्दर और कोमल स्त्री भाव सुखद लगे पढ़ने में ! सुन्दर गीत !

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 23, 2014 at 8:31am

आदरणीय अजय भाई गीत ने भवबिभोर कर दिया .हार्दिक बधाई .

Comment by vandana on January 23, 2014 at 7:23am

बहुत सुन्दर गीत आदरणीय 

Comment by annapurna bajpai on January 23, 2014 at 12:26am

बहुत सुंदर गीत हेतु बधाई आपको आ0 अजय जी । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 22, 2014 at 8:29pm

आ. अजय भाई , सुन्दर गीत रचना के लिये बधाई ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 22, 2014 at 6:50pm

बहुत अच्छा गीत रचा है भाई अजय जी आपने इस भावपूर्ण गीत के लिये बधाई स्वीकार करें

कृपया ध्यान दे...

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