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तरही ग़ज़ल... क्यों लगे शह्र जैसे खजाना हुआ -- "राज “

212    212    212    212

गाँव से दूर जब से ठिकाना हुआ

बंदिशे काम उसका बहाना हुआ

 

आस में मुन्तज़िर आँखें दर पे टिकी

उसकी सूरत  को देखे ज़माना हुआ

 

गोद में खेल जिसकी पला था कभी

गाँव वो आज कैसे बेगाना  हुआ

 

जानते हैं सभी कबसे बदली नजर

जब से गैरों के घर आना जाना हुआ

 

जो झुलाता तुझे प्यार से डाल पर

वो शज़र देख कितना पुराना हुआ

 

गाँव में क्या नहीं था तेरे वास्ते

क्यों लगे शह्र जैसे खजाना हुआ

 

जल गया है तेरे गाँव का नीड़ वो

बस इसी खब्र से ही बुलाना हुआ

 

सोच तुझको मिला क्या यहाँ से निकल

बस सुकूने दिलों का  मिटाना हुआ

******************************

 मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 31, 2014 at 11:16pm

आदरणीया राजेश जी ग़ज़ल अच्छी लगी बधाई स्वीकार करें
खब्र??


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 31, 2014 at 9:24pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है 

जानते हैं सभी कबसे बदली नजर

जब से गैरों के घर आना जाना हुआ.....बहुत सुन्दर, और सीधी-सादी  गिरह लगाई है..वाह!

हार्दिक बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 31, 2014 at 8:10pm

आ० कुंती जी आपकी सराहना से ग़ज़ल धन्य हुई ...तहे दिल से आभार आपका आपकी जर्रानवाजी से ममनून हुई 

Comment by coontee mukerji on January 31, 2014 at 8:02pm

बहुत बहुत सुंदर गज़ल है  राजेश जी  अन्य विधाओं के साथ ही आप इस विधा में भी माहिर है. हार्दिक बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 31, 2014 at 5:29pm

प्रिय सरिता जी ग़ज़ल आपको पसंद आई तहे दिल से आभारी हूँ 

Comment by Sarita Bhatia on January 31, 2014 at 4:49pm

राजेश दी शानदार तरही गजल 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 31, 2014 at 3:19pm

आ० पवन जी ग़ज़ल की सराहना हेतु तहे दिल से शुक्रिया खब्र =सूचना के अर्थ में लिया गया है.  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 31, 2014 at 3:17pm

आदरणीय योगराज जी, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना से ग़ज़ल धन्य हुई ,आश्वस्त भी हुई ग़ज़ल के भाव सम्प्रेषण में सार्थक हुए .आपका तहे दिल से आभार 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 31, 2014 at 1:06pm

बहुत ही खूबसूरत मुसलसल ग़ज़ल हुई है आ० राजेश कुमारी जी, हर शेअर सन्देश दे रहा है. निम्नलिखित शेअर तो बहुत ही कमाल का हुआ है.  

//गाँव में क्या नहीं था तेरे वास्ते
क्यों लगे शह्र जैसे खजाना हुआ //

अपनी जन्म भूमि छोड़ शहर गए बन्दे से बहुत ही अच्छा सवाल पूछा गया है,  इस कलाम पर मेरी दिली बधाई स्वीकारें।

Comment by pawan amba on January 31, 2014 at 12:58pm

गाँव में क्या नहीं था तेरे वास्ते

क्यों लगे शह्र जैसे खजाना हुआ

 खब्र ..kaa arth sapsht kar de krpyaa....mujhe malum nahi...

bahut sundar rachnaa hai aapki

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