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क्या तुम्हें उपहार दूँ : एक गीत (नीरज कुमार नीर)

क्या तुम्हें उपहार दूँ,

प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

 

तुम वसंत हो, अनुगामी

जिसका पर्णपात नहीं.

सुमन सुगंध सी संगिनी,

राग द्वेष की बात नहीं.

 

शब्द अपूर्ण वर्णन को

ईश्वर के वरदान का.

 

विकट ताप में अम्बुद री,

प्रशांत शीतल छांव सी,

तप्त मरू में दिख जाए,

हरियाली इक गाँव की.

 

कहो कैसे बखान करूँ

पूर्ण हुए अरमान का.

 

मैं पतंग तुम डोर प्रिय,

तुम बिन गगन अछूता है.

तुमसे बंधकर  जीवन

व्योम उत्कर्ष छूता है.

 

तुम ही कथाकार हो, इस

जीवन के आख्यान का.

 

क्या तुम्हें उपहार दूँ,

प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Views: 878

Comment

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Comment by Neeraj Neer on February 11, 2014 at 10:34pm

आ. लडिवाला साहब .. आपका धन्यवाद.

Comment by MAHIMA SHREE on February 11, 2014 at 9:46pm

बहुत सी सुंदर गीत ..कोमल भावों से सजी प्रस्तुती के लिए हार्दिक बधाई आपको /


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 11, 2014 at 7:57pm

इस गीत की भाव दशा और कहन बहुत प्रभावित करते हैं.. बहुत बहुत बधाई 

मैं पतंग तुम डोर प्रिय,

तुम बिन गगन अछूता है..........प्रिय प्रीत को समर्पित बहुत सुन्दर शब्द 

लेकिन गीत में अंतर्गेयता के लिए शब्द समुच्चय नियम का निर्वहन या पंक्तियों में कुल मात्रिकता की एकरूपता में कमी प्रवाह को बाधित कर रही है... इन बिन्दुओं पर अवश्य ही ध्यान दें 

सादर शुभकामनाएं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 11, 2014 at 7:32pm

आदरणीय नीरज जी एक खूबसूरत गीत रचा है आपने बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 11, 2014 at 7:10pm

सुन्दर रचना के लिए बधाई 

Comment by Neeraj Neer on February 11, 2014 at 9:16am

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय विजय निकोरे साहब.. 

Comment by Neeraj Neer on February 11, 2014 at 9:16am

शुक्रिया रमेश कुमार चौहान जी ..

Comment by vijay nikore on February 10, 2014 at 11:08pm

अति सुन्दर प्रस्तुति ! बधाई

 

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 10, 2014 at 9:35pm

बहुत ही सुंदर आदरणीय नीरजजी, बधाई बधाई

Comment by Neeraj Neer on February 10, 2014 at 9:03pm

हार्दिक आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब , आपकी टिप्पणियां लिखने का हौसला देती है 

कृपया ध्यान दे...

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