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कह मुकरियाँ -- शशि पुरवार

इस विधा में प्रथम प्रयास है -- ( १- ४ )

सुबह सवेरे रोज जगाये
नयी ताजगी लेकर आये
दिन ढलते, ढलता रंग रूप
क्या सखि साजन ?
नहीं सखि धूप

साथ तुम्हारा सबसे प्यारा
दिल चाहे फिर मिलू दुबारा
हर पल बूझू , यही पहेली
क्या सखि साजन ?
नहीं सहेली

रोज ,रात -दिन चलती जाती
रुक गयी तो मुझे डराती
झटपट चलती है ,खड़ी - खड़ी
क्या सखि साजन ?
ना काल घडी

धन की गागर छलकी जाये
पाने वाला खुश हो जाये
देने वाला बने धनवान
क्या सखि साजन ?
नहीं सखि ज्ञान

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by अजीत शर्मा 'आकाश' on March 16, 2014 at 6:04pm

अच्छी कह मुकरियों के लिये हार्दिक बधाई ॥

Comment by अजीत शर्मा 'आकाश' on March 16, 2014 at 6:02pm

अच्छी कह मुकरियों के लिये हार्दिक बधाई ॥

Comment by shashi purwar on February 26, 2014 at 4:10pm

आदरणीय योगराज जी मुकरिया के जबाब में आपकी मुकरिया बहुत अच्छी लगी आपको बधाई और तहे दिल से आभार

Comment by shashi purwar on February 26, 2014 at 4:09pm

आदरणीय अरुण जी मार्गदर्शन हेतु तहे दिल से आभार

आदरणीय आशुतोष जी  इस विधा को पढ़कर बहुत आनंद आया तो रहा ही नहीं गया ,भूल यह हो गयी इसके बारे में ज्यादा ज्ञात नहीं था सिर्फ सुना ही था। आपका आभार

राम जी बहुत बहुत धन्यवाद 

आदरणीय प्राची जी इस सन्दर्भ में कुछ भ्रम होने की बजह से यह गलती हुई मार्गदर्शन हेतु आभार , इन्हे जरुर परिवर्तित कर दूँगी

Comment by shashi purwar on February 26, 2014 at 4:04pm

आदरणीय योगराज जी आभार आपकी प्रतिक्रिया से गलती समझ गयी और आपकी मुकरियाँ पढ़कर आनंद आया और मुस्कान भी :)

मुझे यह ज्ञात नहीं था की साजन का ही भ्रम दिखाना है कुछ और जगह बहुत से भाव की मुकरी पढ़ी थी इसीलिए भ्रमित हो गयी , पर इन्हे अब सुधार लूंगी

मार्गदर्शन हेतु तहे दिल से आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2014 at 1:53pm

कहमुकारियों पर सुन्दर प्रयास हुआ है आ० शशि जी 

विधा के अनुसार कह्मुकरी में पहली तीन पंक्तियों में साजन की ही बात होने का भ्रम होना चाहिए तो.. इस दृष्टि से पंक्तियाँ पुल्लिंग संज्ञा का निर्वहन करटी हुई होनी चाहियें...

रोज ,रात -दिन चलती जाती
रुक गयी तो मुझे डराती
झटपट चलती है ,खड़ी - खड़ी.................यहाँ तो स्त्रेकिंग संज्ञा की बात की गयी है 
क्या सखि साजन ?............................तो साजन का भ्रम कैसे हो सकता है ?
ना काल घडी

इस प्रयास पर मेरे शुभकामनाएं 

सस्नेह 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 22, 2014 at 6:22pm

आदरणीया शशि जी ...अभी कुछ दिनों से ही काव्य की इस बिधा पर लगातार पढने को मिल रहा है ..बचपन में कुछ फ़िल्मी गीत इस तरह के सुने थे ..आपका प्रयास बहुट अच्छा लगा ..मेरे मन में जो संसय थे उनका निवारण विद्वतजनो ने पहली ही कर दिया है ..आपको तहे दिल बधाई के साथ ..सादर 

Comment by ram shiromani pathak on February 22, 2014 at 2:04pm

सुन्दर प्रस्तुति आदरणीया शशि जी,बाकी गुरुजनों ने कह ही दिया है .........   सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on February 21, 2014 at 9:01pm

आदरणीया , रुक ( RUK) के र में छोटे उ की मात्रा होती है। रूप ( ROOP) के र में बड़े ऊ की मात्रा होती है अतएव रुक को दो और रूप को ३ मात्रा में गिना जाता है।


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on February 21, 2014 at 3:23pm

//रोज ,रात -दिन चलती जाती
रुक गयी तो मुझे डराती
झटपट चलती है ,खड़ी - खड़ी
क्या सखि साजन ?
ना काल घडी//

कहमुकरी ऊपर से जाए   
नर या मादा समझ न आए   
राजन को कर डाला रजनी
क्या "शशि" साजन ?
ना "शशि" सजनी

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