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ज़िंदा हूँ मगर जीने का एहसास नही है

इक उसके चले जाने से कुछ पास नही है
ज़िंदा हूँ मगर जीने का एहसास नही है


वो दूर गया जब से ये बेजान है महफिल

साग़र है सुराही हैं मगर प्यास नही है


सुनने को तिरे पास भी जब वक़्त नही तो

कहने को मिरे पास भी कुछ ख़ास नहीं है

 

इस रूह के आगोश में है तेरी मुहब्बत
माना के तिरा प्यार मिरे पास नही है

रावण तो ज़माने में अभी ज़िंदा रहेगा
क़िस्मत में अभी राम के बनवास नही है

फिर कैसे यक़ी तुझपे करेगा ये ज़माना,
ख़ुद तुझको ही जब अपने पे विश्वास नही है

लेकर तो चला आया समंदर में मैं कश्ती
हिम्मत के सिवा कुछ भी मिरे पास नही है

ये राहे वफ़ा का है सफ़र सोच समझ ले
बस काई पे चलना है यहाँ घास नहीं है 

रिश्ते जो उगे झूठ की मिट्टी में है ‘सूरज’
फूलेंगे फलेंगे ये मुझे आस नही है

डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

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Comment

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Comment by Omprakash Kshatriya on April 2, 2014 at 3:05pm

शानदार ग़ज़ल . बधाई 

Comment by Yamit Punetha 'Zaif' on March 28, 2014 at 7:40pm
बहुत उम्दा!! वाह !

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 27, 2014 at 7:26pm

आदरणीय डॉक्र साहब, खेद है, मैं आज आपकी ग़ज़ल पर आ पारहा हूँ. इस उम्दा और क़ामयाब ग़ज़ल का एक-एक शेर दिल में घर बनाता हुआ है. किस एक की बात करूँ.

दिल से बधाई.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 26, 2014 at 9:13pm

ये राहे वफ़ा का है सफ़र सोच समझ ले
बस काई पे चलना है यहाँ घास नहीं है 

सुनने को तिरे पास भी जब वक़्त नही तो

कहने को मिरे पास भी कुछ ख़ास नहीं है

बहुत सुन्दर 

हार्दिक बधाई 

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on March 24, 2014 at 4:02pm

क्या बात है..बहुत उम्दा.. दिल खुश हो गया.. और क्या कहूँ इससे ज़्यादा..

इस रूह के आगोश में है तेरी मुहब्बत
माना के तिरा प्यार मिरे पास नही है.. ...वाह

Comment by वीनस केसरी on March 24, 2014 at 1:13am

सुनने को तिरे पास भी जब वक़्त नही तो

कहने को मिरे पास भी कुछ ख़ास नहीं है

छा गए भाई
जिंदाबाद

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 24, 2014 at 12:05am

आप सभी दोस्तों  की दिली दुवाओं के लिए बहुत बहुत शुक्र गुजार  हूँ ! ज़र्रानवाज़ी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ! 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 23, 2014 at 2:34pm

बहुत खूब सूर्या जी, अच्छे अशआर हुए हैं दाद कुबूल कीजिये

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 23, 2014 at 1:03pm

रिश्ते जो उगे झूठ की मिट्टी में है ‘सूरज’
फूलेंगे फलेंगे ये मुझे आस नही है

शानदार गजल 

जानदार बधाई 

किस्मत मेरी 

आपने सुनाई 

सादर 

Comment by Anil 'Bekas' on March 23, 2014 at 12:17pm
हर एक शेयर कमाल है। बहुत ही उम्दा लिखा आपने।
हार्दिक बधाई।

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